Sunday, June 14, 2020

भाषा शिक्षण में सुनने और बोलने कि क्षमता

भाषा के माध्यम से मानव जीवन अर्थपूर्ण हुआ है। भाषा मानव जीवन को सरल और सहज बनाने में महत्वपूर्ण है। भाषा के माध्यम से व्यक्ति अपने विचार और भाव प्रकट कर सकता है। मानव ईश्वर की बनाई हुई अन्य रचनाओं में से श्रेष्ठ इसलिए है क्योंकि उसे भाषा कौशल का ज्ञान है।भाषा बौद्धिक क्षमता को भी व्यक्त करती है। भाषा एक ऐसी कला है जिसे अन्य कलाओं की भांति सीखा जा सकता है और उसमें निपुणता हासिल की जा सकती है।
भाषा को श्रवण एवमं वाचक द्वारा ग्रहण किया जा सकता है। भाषा में दिन-प्रतिदिन नित नए विकास होते रहते है। भाषा में चार प्रकार के कौशल होते है श्रवण कौशल, वाचिक कौशल, लेखन कौशल और पठन कौशल। श्रवण कौशल और वाचक कौशल, भाषा कौशल के प्रथम चरण में आते है।

श्रवण कौशल की भूमिका:

  • श्रवण कौशल का अर्थ है कानों द्वारा सुनना। इस प्रक्रिया में किसी दूसरे व्यक्ति द्वारा कही गई बात को सुनते है और उसका भाव ग्रहण करते है। यह शिक्षा के आदान-प्रदान का महत्वपूर्ण भाग है। इसमें व्यक्ति कविता, कहानी, भाषण वाद-विवाद, वार्तालाप आदि का ज्ञान सुनकर ही प्राप्त करता है और उसका अर्थ भी ग्रहण करता है। यदि व्यक्ति की श्रवण इन्द्रियों में दोष है, तो वह न तो भाषा सीख सकता है और न अपने मनोभावों को व्यक्त कर सकता है। अत: उसका भाषा ज्ञान शून्य के बराबर ही रहेगा। बालक सुनकर ही अनुकरण द्वारा भाषा ज्ञान अर्जित करता है। श्रवण कौशल भाषा के विकास का आधार है इसमें महत्वपूर्ण भूमिका भी निभाता है।
  • श्रवण कौशल के माध्यम से छात्र शब्दों का सही उच्चारण सीखता है। जब ब्यक्ति किसी शब्द को सुनता है और समझता है तब ही वह उस शब्द से संबंधित सही अर्थ को समझता है। व्यक्ति शब्दों का सही उच्चारण कर रहा है या नहीं यह श्रवण कौशल के माध्यम से साफ होता है। इसके परिणामस्वरूप उसके भाषा सम्बंधी कौशल में विकास होता है।
  • श्रवण कौशल में व्यक्ति रोज नए शब्दों को सुनता है और अपने भाषायी ज्ञान में विकास करता है। इस कौशल से व्यक्ति अपने शब्दकोश में वृद्धि करता है जिसके माध्यम से उसके भाषा कौशल में विकास होता है।
  • सुनकर व्यक्ति अधिक से अधिक ज्ञान अर्जित कर सकता है, यह ऐसी प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति दिन-प्रति दिन बिना किसी रूकावट के ज्ञान प्राप्त कर सकता है और उस ज्ञान को अपने विवेकानुसार प्रयोग कर सकता है। छात्र रेडियो, मोबाइल, टीवी, ओडियो कैसेट जैसे उपकरणों के माध्यम से सामाजिक व्यवहारिक जानकारियां प्राप्त कर सकता है।
  • सुनने की प्रक्रिया के माध्यम से व्यक्ति दूसरों के भावों, विचारों, अभिव्यक्तियों को ग्रहण कर सकता है। ध्वनि व्यक्ति के मस्तिष्क में एक छाप छोड़ती है जिससे उस विशेष शब्द से संबंधित ध्वनि व्यक्ति को स्मरण रह जाती है।

वाचिक कौशल की भूमिका:

  • बोलकर व्यक्ति अपनी अभिव्यक्ति, मनोभावों को प्रकट करता है। इस प्रक्रिया में व्यक्ति बोलकर लोगों से संवाद स्थापित करता है। साथ ही संचार की प्रक्रिया पूर्ण होती है। वाचिक कौशल में निपुणता से छात्र मे आत्मविश्वास उत्पन्न होता है जो कि शिक्षण और बच्चे के सम्पूर्ण विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है।
  • वाचिक कौशल से यह पता लगाया जा सकता है कि शिक्षण प्रक्रिया में कोई त्रुटि तो नहीं है। वाचिक कौशल से मूल्यांकन प्रक्रिया में सहायता मिलती है। इसके माध्यम से अध्यापक छात्र की भाषा से संबंधित त्रुटियों का पता लगा सकता है। और शिक्षण के दौरान उन त्रुटियों को दूर करके छात्र को निपुण बना सकता है।
  • आधुनिक युग में समाज में अपनी छवि को बनाने के लिए और स्वयं को प्रस्तुत करने के लिए आत्मविश्वास का होना बहूत जरूरी है। यह आत्मविश्वास छात्र में वाचिक कौशल में निपुणता से प्राप्त होता है। इससे छात्र झिझक को खत्म कर आगे कदम बढ़ाता है। जब तक छात्र अपने विचार अभिव्यक्त करना नहीं सिखता है तब तक उसमें भाषा का विकास नहीं होता। वाचिक कौशल में कक्षा में ही सुधार किया जाता है। कक्षा में छात्र संकोच समाप्त करके बोलना आरम्भ करता है और विभिन्न विषयों पर वाद-विवाद करता है। जिससे उसका शिक्षण विकास होता है।
  • बोलने के माध्यम से छात्र भाषा प्रवाह में प्रवीणता और निपुणता हासिल करता है। भाषा में उसकी दक्षता और मजबूत होती है। भाषा विकास में बोलने का काफी महत्व है। भाषण, वाद-विवाद प्रतियोगिता, प्रश्नोत्तरी के माध्यम से शिक्षण प्रक्रिया को सुदृढ़ बनाता है। यह बालक को मौखिक अभिव्यक्ति के लिए प्रेरित करता है जो उसके भाषा विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भाषा का विकास प्रतिदिन होता है यदि बोलने का कौशल छात्र में विकसित नहीं होता तो इस स्थिति में सीखने की प्रक्रिया बहुत धीमी हो जाती है।

भाषा शिक्षण के सूत्र और विधियाँ

दूसरों को सिखाने के लिए दिशा निर्देश देने तथा अन्य प्रकार से उन्हें निर्देशित करने की प्रक्रिया को शिक्षण कहते हैं। यह एक उद्देश्य निर्देशित क्रिया होती है, जिसमें सीखने के लिए सही मार्गदर्शन, दिशाबोधन और उत्साह द्वारा प्रेरित किया जाता है। यह एक ऐसी व्यवस्था है, जिसमें शिक्षक ज्ञान देने के लिए अनेक क्रियाएँ करता है और छात्रों के व्यवहार में अपेक्षित परिवर्तन लाने का प्रयास करता है।
ज्ञान देने की यही क्रियाएँ शिक्षण सूत्र या विधियाँ कहलाती हैं। आमतौर पर एक ही विषय या चीज़ को पढ़ाने के बहुत से तरीके हो सकते हैं, जिनके द्वारा एक शिक्षक छात्रों के मानसिक स्तर, उनकी आवश्यकताओं और शिक्षण की आवशयक्ताओं को ध्यान में रखते हुए ज्ञान देता है। इसलिए ही शिक्षण को एक कौशलात्मक क्रिया कहते हैं, क्यूंकि यह शिक्षक का कौशल ही है जिसके द्वारा वह सही समय पर सही विधि या सूत्र द्वारा छात्रों को सही शिक्षा देता है।

सही और सार्थक शिक्षण के लिए कुछ शिक्षण सूत्र और विधियाँ इस प्रकार से हैं –

  • ज्ञात से अज्ञात की ओर - प्राथमिक स्तर यह विधि सबसे अधिक लोकप्रिय होती है। छोटे बच्चों को शिक्षण के प्रति उत्साहित और सक्रीय बनाने के लिए शिक्षक सदैव वहीं से प्रारम्भ करता है, जो बच्चों के अनुभव क्षेत्र में आती हैं और उन्हें पता होती हैं। जैसे - लिखना या पढ़ना सिखाने के लिए चित्रों का सहारा लिया जाता है। बच्चे आसपास देख कर चित्र पहचान जाते हैं कि यह पंखा है और उसका उच्चारण भी जानते हैं। उसी से उन्हें 'प' और 'ख' वर्णों के स्वरुप और लिखाई से परचित कराया जाता है।
  • मूर्त से अमूर्त की ओर - इस सूत्र को ‘‘स्थूल से सूक्ष्म की ओर’ या 'प्रत्यक्ष से प्रत्यक्ष की ओर' भी कहा जाता है। स्पष्ट रूप से जो चीज़ आप सामने देख सकते हैं, उसी से छिपी हुईं चीज़ या ज्ञान के बारे में सीखना अधिक सरल हो जाता है। माॅडल, चार्ट आदि के सहारे किसी वस्तु का वर्णन करना सरल होता है, क्यूंकि कोई भी घटना, वस्तु, चित्र या लिखित वस्तु सामने देखकर वो मस्तिष्क पर अधिक प्रभाव डालता है, समझने में सरल लगता है और लम्बे समय तक स्मरण भी रहता है।
  • सरल से जटिल की ओर - वैसे तो यह सूत्र/विधि हर स्तर पर उपयोगी सिद्ध होती है, परन्तु प्राथमिक स्तर पर और कोई नयी चीज़ सिखाने हेतु काफी लाभदायक होती है। इसमें शिक्षक विषय के सरल भाग से प्रारम्भ कर कठिन भाग तक जाता है। जैसे - लेखन शिक्षण सदैव आदि-तिरछी रेखाओं से शुरू होता है, वर्णों से शब्दों तक होते हुए वाक्यों तक पहुँचता है। रेखाएं बनाना सरल होता है, फिर वर्ण सिखाये  जाते हैं, उन्हें जोड़कर सार्थक अर्थ वाले शब्द सिखाये जाते हैं।
  • विशिष्ट से सामान्य की ओर - यह सूत्र माध्यमिक स्तर से आगे के स्तरों पर अधिक प्रभावपूर्ण रहता है। किसी विशेष वस्तु के बारे में जानकार उससे जुड़ी अन्य सामान्य बातों का ज्ञान लेना अधिक सरल और रुचिकर हो जाता है। जैसे - पंखे के बारे में सभी जानते हैं और यह एक विशेष प्रकार की मशीन है। पंखे से प्रारम्भ कर शिक्षक विद्युत् के महत्त्व के बारे में और विद्युत् से चलने वाली कई और मशीनों के बारे में भी जानकारी दे सकता है। छात्र भी इस प्रकार बहुत रूचि लेकर समझने का प्रयास करते हैं।
  • पूर्ण से अंश की ओर - इस सूत्र के अनुसार बच्चों को जो कुछ भी सिखाया जाए, उसे पहले पूर्ण रूप में सामने रखा जाए और बाद में उसके हर अंश को स्पष्ट रूप से स्पष्ट किया जाए। इससे बच्चों में आगे पढ़ाये जाने वाले विषय के प्रति उत्साह और रूचि जागृत होती है। जैसे - पाठ के मूल भाव के बारे में बातकर ही पाठ आरम्भ किया जाता है। इससे बच्चे मूल भाव से जोड़कर पाठ के हर अंश को सही से समझ भी पाते हैं। उसी प्रकार विज्ञान में हमारे शरीर के बारे में थोड़ी जानकारी देकर एक-एक करके शरीर के हर अंग कि जानकारी दी जाती है।
  • आगमन से निगमन की ओर - इस सूत्र के अनुसार अनेक उदाहरण देकर नियम निर्धारित किये जाते हैं। शिक्षक इस विधि का प्रयोग अनेक विषयों में करते हैं, जैसे व्याकरण आदि। उदाहरण के लिए - विभिन्न वाक्य लेकर उनमें किसी विशेष नाम बताने वाले शब्दों का चयन करने के लिए कहा जाए। फिर पुछा जाए कि इन से व्यक्तियों के नाम, वस्तुओं के नाम और स्थानों के नाम अलग किये जायें। अब बताया जाए कि नाम वाले शब्द संज्ञा कहलाते हैं और उसके अनेक प्रकार भी बताये जायें।
  • अनिश्चित से निश्चित की ओर - देखी हुई वस्तु के विषय में बालक अपनी सुविधा और आवश्यकता के अनुसार कुछ अनिश्चित विचार रखता है। इन्हीं अनिश्चित विचारों के आधार पर निश्चित एवं स्पष्ट विचार बनाये जाने चाहिये। अस्पष्ट शब्दार्थों से स्पष्ट, निश्चित तथा सूक्ष्म शब्दार्थों की ओर बढ़ा जाए। उदाहरण के लिए घटना वर्णन के आधार पर सभी छात्रों की राय जानी जाती है और फिर शिक्षक उसपर अपने स्पष्ट विचार रखता है की यह इस प्रकार हुआ, और इसका यही परिणाम होता है।
  • अनुभूति से तर्कयुक्त की ओर - इस सूत्र के अनुसार बच्चों को उनके अनुभवों के आधार पर सिखाने का प्रयास होता है, जिससे उन्हें सही व्यावहारिक ज्ञान रुचिपूर्ण तरीके से मिल सके। कक्षा में बच्चों से विभिन्न स्थितियों में हुईं अनुभूतियों पर चर्चा की जाती है ओर उस आधार पर शिक्षक उन्हें उससे सम्बंधित तर्क से अवगत कराता है।
  • विश्लेषण से संश्लेषण की ओर – उच्च स्तर पर प्रयोग होने वाला यह सूत्र कहता है कि एक बार शब्द, वाक्य भाव या अर्थ का विश्लेषण करके उसे छोड़ न दिया जाए, वरन् बाद में उनका संश्लेषण करके एक स्पष्ट सामान्य विचार बनाने की ओर छात्रों को उन्मुख या प्रोत्साहित किया जाए। विश्लेषण का अर्थ होता है हर पहलू कि जांच पड़ताल करना ओर निष्कर्ष पर पहुचंने का प्रयास करना। संश्लेषण का अर्थ होता है एक सही निष्कर्ष पर पहुंच कर उसे उस ओर सार्थक बनाने के लिए सही तर्क उसमें मिलाना या जोड़ना।
  • मनोवैज्ञानिक से तार्किक की ओर -  यह सूत्र इस बात पर ध्यान देता है कि पहले वह पढाया जाए जो छात्रों की योग्यता एवं रूचि के अनुकूल हो, तत्पश्चात विषय सामग्री के तार्किक क्रम पर ध्यान दिया जाए। इससे बच्चों में उत्साह, रूचि और सक्रियता आती है और वे सीखने में अधिक ध्यान केंद्रित कर पाते हैं। जैसे - बच्चों से उनका अनुभव पुछा जाए कि किस प्रकार उनके आसपास एक छोटा सा पौधा बड़ा होकर पेड़ बन जाता है और बाद में उससे सम्बंधित वैज्ञानिक तर्क दिए जायें। यह बच्चों के व्यावहारिक ज्ञान को बहुत प्रभावित करता है।
शिक्षण विधियों की सूची यहीं समाप्त नहीं होती। अपने शिक्षण और स्थितियों के अनुभव के आधार पर शिक्षण और कई अन्य प्रकार की विधियों का निर्माण और पालन भी कर सकते हैं, जिससे शिक्षण सही प्रकार से किया जा सके। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि शिक्षक परिस्थितयों को सही प्रकार से समझे, आवश्यकताओं को समझे और उस आधार पर सही तकनीक और विधि का चयन कर शिक्षण प्रक्रिया के उद्देश्य को पूर्ण करने का हर संभव प्रयास करे।

अधिगम और अर्जन

अधिगम का अर्थ:

अधिगम  शिक्षण प्रक्रिया का केंद्र बिंदु है, यह एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है। सामान्‍य अर्थ में अधिगम का अर्थ सीखना अथवा व्‍यवहार परिवर्तन है। ये व्‍यवहार परिवर्तन स्‍थायी तथा अस्‍थायी दोनों हो सकते हैं। किन्तु व्यवहार में अभिप्रेरणात्मक स्थिति में उतार चढाव से उत्पन्न अस्थायी परिवर्तन अधिगम नही होते है, कहने का अर्थ यह है कि अनुभवों एवं प्रशिक्षण के बाद बालक के व्‍यवहार में जो सुधार आता है उसी को अधिगम  कहते हैं। अधिगम की प्रक्रिया सभी जीवो में होती है किन्तु उनकी विशिष्टतायें भिन्न भिन्न होती है

अधिगम की परिभाषा:

क्रॉनबैक के अनुसार, “अनुभव के परिणामस्‍वरुप व्‍यवहार परिवर्तन ही अधिगम है।“
क्रो एवं क्रो के अनुसार, “आदतों, ज्ञान व अभिवृत्तियों का अर्जन ही अधिगम है।“
गिलफर्ड के अनुसार, “व्‍यवहार के कारण परिवर्तन ही सीखना है।“
उपरोक्त परिभाषाओं से स्पष्ट होता है कि सीखने के कारण व्यक्ति के व्यवहार में परिवर्तन आता है, व्यवहार में यह परिवर्तन बाह्य एवं आंतरिक दोनों ही प्रकार का हो सकता है। अतः सीखना एक प्रक्रिया है जिसमें अनुभव एवं प्रशिक्षण द्वारा व्यवहार में स्थायी या अस्थाई परिवर्तन दिखाई देता है।

अधिगम की विशेषताएँ

अधिगम की विशेषताएँ इस प्रकार है
  • यह एक सतत चलने वाली, समायोजित और समस्‍या-समाधान की प्रक्रिया है।
  • यह व्‍यवहार परिवर्तन की प्रक्रिया है।
  • यह एक मानसिक प्रक्रिया है।
  • यह एक विवेकपूर्ण, अनुसन्धान और सामाजिक प्रक्रिया है।
  • अधिगम सकारात्‍मक तथा नकारात्‍मक दोनों होता है।
  • अधिगम एक विकसित, सार्वभौमिक और सक्रिय प्रक्रिया है।

शिक्षण एवं अधिगम में सम्‍बन्‍ध:

शिक्षण एवं अधिगम एक-दूसरे से सम्‍बन्धित हैं शिक्षण बच्‍चे में अधिगम उत्‍पन्‍न करता है। अच्‍छे शिक्षण का अर्थ है ज्‍यादा – से ज्‍यादा अधिगम करना। प्रशिक्षण अधिगम का उद्दीपन, निर्देशन एवं प्रोत्‍साहन होता है। जहॉं शिक्षण को शिक्षा अधिगम प्रक्रिया का केन्‍द्र बिन्‍दु माना जाता है वहॉं अधिगम को शिक्षण के केन्‍द्रीय उद्देश्‍य माना जाता है।

शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया के भाग:

मैकडानल्‍ड के अनुसार, समस्‍त शिक्षण अधिगम प्रक्रिया के चार मुख्‍य भाग होते हैं।
1. पाठ्यक्रम
2. अनुदेशन
3. शिक्षण                      
4. अधिगम

अधिगम के आयाम या विमाएं:

अधिगम के आयाम अनुदेशनात्मक योजना के लिए एक अधिगम केन्द्रित रुपरेखा या संरचना है जोकि संज्ञान और अधिगम क्षेत्र के नवीनतम शोध को व्यवहारिक कक्षागत कार्यनीतियों में परिवर्तित करते है, अधिगम आयाम की रूप-रेखा शिक्षण अधिगम प्रक्रिया के लिए  निम्न परिप्रेक्ष्य में सहायक होती है।
  • शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में अधिगम को केन्द्रीय बनाये रखने में
  • अधिगम प्रक्रिया का अध्ययन करने में
  • पाठ्यक्रम, अनुदेशन और आंकलन की योजना बनाये रखने में
विद्यार्थियों के व्‍यवहार तथा अधिगम लक्ष्‍यों को तीन क्षेत्रों में बाँटा जा सकता है।
1. ज्ञानात्‍मक
2. भावात्मक
3. क्रियात्‍मक
शिक्षण के द्वारा जब विद्यार्थी में व्‍यवहार परिवर्तन होता है तो वह व्‍यवहार परिवर्तन अथवा अधिगम इनमें से किसी भी क्षेत्र के साथ सम्‍बन्धित हो सकता है। अधिगम के अनुसार शिक्षण भी तीन प्रकार का हो सकता है

शैक्षिणक उद्देश्‍य एवं अधिगम:

उद्देश्‍यशिक्षण विधिअधिगम
ज्ञानात्‍मक
भावात्‍मक
क्रियात्‍मक
भाषण
नाटकीकरण
प्रयोग
जानना
अनुभव करना
करना
तालिका से स्‍पष्‍ट है कि जैसा शिक्षण होगा विद्यार्थी में वैसा ही अधिगम होगा।

अधिगम के नियम:

ई॰एल॰ थार्नडाइक अमेरिका का प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक हुआ है जिसने सीखने के कुछ नियमों की खोज की जिन्हें निम्नलिखित दो भागों में विभाजित किया गया है, जिनमे तीन मुख्य नियम और पांच गौण नियम है । सीखने के मुख्य नियम तीन है जो इस प्रकार हैं ।
1. तत्परता का नियम: इस नियम के अनुसार जब व्यक्ति किसी कार्य को करने के लिए पहले से तैयार रहता है तो वह कार्य उसे आनन्द देता है एवं शीघ्र ही सीख लेता है। इसके विपरीत जब व्यक्ति कार्य को करने के लिए तैयार नहीं रहता या सीखने की इच्छा नहीं होती है,तो वह बेमन जाता है या सीखने की गति धीमी होती है।इस नियम से कार्य शीघ्र होता है|
2. अभ्यास का नियम: इस नियम के अनुसार व्यक्ति जिस क्रिया को बार-बार करता है उस शीघ्र ही सीख जाता है तथा जिस क्रिया को छोड़ देता है या बहुत समय तक नहीं करता उसे वह भूलने लगताहै। जैसे‘- गणित के सवाल हल करना, टाइप करना, साइकिल चलाना आदि। इसे उपयोग तथा अनुपयोग का नियम भी कहते हैं। इस नियम से कार्य कुशलता आती है
3. प्रभाव का नियम: इस नियम के अनुसार जीवन में जिस कार्य को करने पर व्यक्ति पर अच्छा प्रभाव पड़ता है या सुख का या संतोष मिलता है उन्हें वह सीखने का प्रयत्न करता है एवं जिन कार्यों को करने पर व्यक्ति पर बुरा प्रभाव पडता है उन्हें वह करना छोड़ देता है। इस नियम को सुख तथा दुःख या पुरस्कार तथा दण्ड का नियम भी कहा जाता है।

गौण के नियम:

1. बहु अनुक्रिया नियम: इस नियम के अनुसार व्यक्ति के सामने किसी नई समस्या के आने पर उसे सुलझाने के लिए वह विभिन्न प्रतिक्रियाओं के हल ढूढने का प्रयत्न करता है। वह प्रतिक्रियायें तब तक करता रहता है जब तक समस्या का सही हल न खोज ले और उसकी समस्यासुलझ नहीं जाती। इससे उसे संतोष मिलता है थार्नडाइक का प्रयत्न एवं भूल द्वारा सीखने का सिद्धान्त इसी नियम पर आधारित है।
2. मानसिक स्थिति या मनोवृत्ति का नियम: इस नियम के अनुसार जब व्यक्ति सीखने के लिए मानसिक रूप से तैयार रहता है तो वह शीघ्र ही सीख लेता है। इसके विपरीत यदि व्यक्ति मानसिक रूप से किसी कार्य को सीखने के लिए तैयार नहीं रहता तो उस कार्य को वह सीख नहीं सकेगा।
3. आंशिक क्रिया का नियम: इस नियम के अनुसार व्यक्ति किसी समस्या को सुलझाने के लिए अनेक क्रियायें प्रयत्न एवं भूल के आधार पर करता है। वह अपनी अंर्तदृष्टि का उपयोग कर आंषिक क्रियाओं की सहायता से समस्या का हल ढूढ़ लेता है।
4. समानता का नियम: इस नियम के अनुसार किसी समस्या के प्रस्तुत होने पर व्यक्ति पूर्व अनुभव या परिस्थितियों में समानता पाये जाने पर उसके अनुभव स्वतः ही स्थानांतरित होकर सीखने में मद्द करते हैं।
5. साहचर्य परिवर्तन का नियम: इस नियम के अनुसार व्यक्ति प्राप्त ज्ञान का उपयोग अन्य परिस्थिति में या सहचारी उद्दीपक वस्तु के प्रति भी करने लगता है। जैसे-कुत्ते के मुह से भोजन सामग्री को देख कर लार टपकरने लगती है। परन्तु कुछ समय के बाद भोजन के बर्तनको ही देख कर लार टपकने लगती है।

अधिगम प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले कारक:

अधिगम को प्रभावित करने वाले कारकों को निम्‍नलिखित वर्गो में विभाजित किया जा सकता है।
1. अधिगमकर्ता से सम्‍बन्धित कारक
2. अध्‍यापक से सम्‍बन्धित कारक
3. विषय-वस्‍तु से सम्‍बन्धित कारक
4. प्रक्रिया से सम्‍बन्धित कारक
अधिगमकर्ता से सम्‍बन्धित कारक: अधिगमकर्ता का शारीरिक एवं मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य कैसा है, उसकी क्षमता कितनी है, वह तीव्र या मंद बुद्धि का है, वह कितना जिज्ञासु है, वह क्‍या हासिल करना चाहता है, उसके जीवन का उद्देश्‍य क्‍या है,आदि  इन बातों पर उसके सीखने की गति, इच्‍छा एवं रुचि निर्भर करती है।
अध्‍यापक से सम्‍बन्धित कारक: अधिगम की प्रक्रिया को प्रभावित करने में शिक्षक की भूमिका महत्‍वपूर्ण होती है। अध्‍यापक का विषय पर कितना अधिकार है, यह शिक्षण कला में कितना योग्‍य है? उसका व्‍यक्तित्‍व एवं व्‍यवहार कैसा है, वह अधिगम के लिए उचित वातावरण तैयार कर रह है या नही, इन सबका प्रभाव बालक के अधिगम, इसकी मात्रा एवं इसकी गति पर पड़ता है। अध्‍यापक के शारीरिक एवं मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य का भी बालक के अधिगम से सीधा समबन्‍ध होता है। एक स्‍वस्‍थ शिक्षक ही सही ढंग से बच्‍चों को पढ़ा सकता है।
विषय-वस्‍तु से सम्‍बन्धित कारक: अधिगम की प्रक्रिया में यदि विषय बालक अनुकूल न हों तो इसका अधिगम पर भी प्रभाव पड़ता है। विषय-वस्‍तु बालक की रुचि के अनुकूल है या नहीं, उस विषय की प्रस्‍तुति किस ढंग से की गयी है, इन सब बातों को प्रभाव बालक के अधिगम पर पड़ता है।
प्रक्रिया से सम्‍बन्धित कारक: विषय-वस्‍तु को यदि सुव्यवस्थित तरीके से प्रस्‍तुत  नही किया जाए, तो  बालक को इसे समझने में कठिनाई होती है। सतत अभ्‍यास के द्वारा ही किसी विषय-वस्‍तु को पूर्णत: समझा जा सकता है, शिक्षण अधिगम सम्‍बन्‍धी परिस्थितियॉं एवं वातावरण बालक को ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रेरित करता है जिससे उसके अधिगम की गति स्‍वत: बढ़ जाती है।

अधिगम का महत्त्व:

अधिगम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बुद्धि और विकास में सहायक है, यह जीवन की आवश्यकतायों को समझने, वातावरण को अनुकूल बनाने, ज्ञान प्राप्त करने और हमें कुशल एव योग्य बनाने में सहायक है|

भाषा शिक्षण के सिद्धांत

भौतिक या आध्यात्मिक रूप से, हर कथन एक मूलभूत सच्चाई—एक सिद्धांत—का उदाहरण है और हर कथन नियमों के लिए आधार प्रदान करता है। लेकिन, नियम अल्पकालिक हो सकते हैं और वे सुनिश्‍चित होते हैं। दूसरी ओर, सिद्धांत व्यापक होते हैं और सर्वदा टिक सकते हैं।उदाहरण के लिए, एक बच्चे को शायद यह नियम दिया जाए, “स्टोव को नहीं छूना।” लेकिन एक वयस्क के लिए इतना कहना ही काफ़ी होगा कि “स्टोव गरम है।” ध्यान दीजिए कि आख़िरी कथन ज़्यादा व्यापक है। क्योंकि यह सच्चा कथन हमारे कार्यों पर असर डालेगा—इस मामले में अगर हम पकाएँ, सेकें, या स्टोव बंद करें—यह एक अर्थ में एक सिद्धांत बन जाता है।उसी प्रकार भाषा शिक्षण के कुछ प्रमुख सिद्धांत होते हैं, जिनसे सही एवं प्रभावी शिक्षण का आधार स्पष्ट होता है। सर्वप्रथम, यह जानना महत्त्वपूर्ण है कि शिक्षण हेतु तीन तत्वों का होना अत्यावश्यक है - शिक्षक, शिक्षार्थी एवं पाठ्यक्रम(पठन सामग्री)। इन्ही तत्वों पर शिक्षण के सभी सिद्धांत आधारित हैं क्यूंकि शिक्षक शिक्षार्थी को पाठ्यक्रम कैसे, कब और क्यों पढ़ाये, जिससे प्रभावी शिक्षण हो सके, यही सब शिक्षण को सही दिशा प्रदान करते हैं।

सबसे पहले शिक्षण के कुछ सामान्य सिद्धांत हैं, जो शिक्षक को किसी भी प्रकार का पाठ पढ़ाते समय ध्यान रखने चाहिए।

  • रूचि जागृत करने का सिद्धांत - छात्र के लिए शिक्षण तब तक सफल नहीं हो पायेगा, जब तक वह उसमे रूचि नहीं लेगा। पहले दंड या अनुशासन के माध्यम से ज्ञानार्जन कि प्रेरणा दी जाती थी। किन्तु अब रूचि जागृत करने पर अधिक बल दिया जाता है, जिससे छात्र स्वेच्छा से, पूरा ध्यान केंद्रित कर शिक्षा ग्रहण करें। तभी वे पाठ्य वास्तु के सही उद्देश्य और मूल भाव को समझकर शिक्षण सफल बनाएंगे।
  • प्रेरणा का सिद्धांत - यह भाषा अधिगम हेतु सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत है। रूचि, आवश्यकता और प्रयोजन शिक्षण में प्रमुख प्रेरक होते हैं। उद्देश्यहीन, प्रयोजन-रहित कार्य शिक्षण कार्य में शिथिलता उत्त्पन्न करते हैं। अतः हर संभव प्रयास द्वारा छात्रों को ज्ञानार्जन हेतु प्रेरित करना शिक्षक के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है।
  • क्रिया द्वारा सिखाने (व्यावहारिक ज्ञानका सिद्धांत - यह शिक्षण हेतु सबसे प्रभावी सिद्धांत है, जो छात्रों में रूचि और प्रेरणा भी जागृत करता है। इसके अनुसार जो भी बालक को सिखाया जाए, उसे बालक एक निष्क्रिय श्रोता नहीं, अपितु सक्रीय प्रतिभागिता द्वारा पूर्ण ध्यान केंद्रित करते हुए सीखने का प्रयास करता है।

 मनोवैज्ञानिकों ने भाषा शिक्षण हेतु कुछ अन्य महत्वपूर्ण सिद्धांत भी दिए हैं, जो इस प्रकार हैं:

  1. अनुबंधन का सिद्धांत - बच्चों के भाषा विकास हेतु यह बहुत महत्वपूर्ण है कि सीखने में यदि प्रत्यक्ष किसी चीज़ का प्रयोग हो, तो शिक्षण का यह तरीका बहुत सरल और रुचिकर होगा। जैसे - दूध या पंखा को पुस्तकों की बजाय प्रत्यक्ष दिखाकर उसके बारे में सरलता से उसकी जानकारी दी जा सकती है।                                                                                                                 
  2. अनुकरण का सिद्धांत - वायगोत्स्की के अनुसार बच्चा सामजिक अंतःक्रिया द्वारा भाषा अर्जित करता है और सीखता है। यह प्रक्रिया सरल, सहज व् स्वाभाविक रूप से होती है।यदि उसके परिवार, समाज में कोई भाषा सम्बन्धी त्रुटि है, तो वह मातृभाषा के प्रभाव से बच्चे में भी आ जाती है।
  3. भाषा अर्जन का सिद्धांत - यह सिद्धांत मुख्यतः चॉम्स्की का दिया हुआ है। उनके अनुसार बच्चों में भाषा सीखने की जन्मजात क्षमता होती है। उन्होंने सार्वभौमिक व्याकरण का नियम बताते हुए बताया था कि बच्चे एक निश्चित समय में अनुकरण द्वारा भाषा नियम जानकर धीरे-धीरे सही वाक्य बनाना सीख जाते हैं और नए शब्द भी सीख जाते हैं।
  4. क्रियाशीलता का सिद्धांत - यह सिद्धांत भाषा प्रयोगों के अधिकाधिक अवसरों और सृजनात्मकता की ओर ध्यान देता है। इसके अनुसार कक्षा में परिचर्चा करना, प्रश्न पूछना आदि सहगामी क्रियायें बच्चों को सक्रीय, पठन के प्रति सजग, प्रोत्साहित और आनंदित रखती है। इससे भाषा शिक्षण बहुत सरल हो जाता है।
  5. अभ्यास का सिद्धांत - किसी भी चीज़ को सीखने के लिए अभ्यास सबसे महत्वपूर्ण होता है क्यूंकि उसी से वह हमारे व्यवहार में आती है और निपुणता भी आती है। भाषा प्रयोग के अधिकाधिक लिखित, मौखिक या वैचारिक अवसर मिलने से बच्चों का भाषा विकास सही प्रकार से होना संभव है।
  6. जीवन समन्वय (ज्ञात से अज्ञात) का सिद्धांत - यह वैज्ञानिकों द्वारा सर्वमान्य है कि बच्चे उन विषयों में बहुत रूचि लेते हैं, जो उन्हें अपने जीवन से सम्बंधित लगती है। अतः किसी विषय को बच्चों के जीवन से जोड़कर उदाहरण द्वारा सिखाने से बच्चे उसे पूर्ण रूचि और प्रतिभागिता से सीखने का प्रयास करेंगे।
  7. उद्देश्यपूर्ण शिक्षण का सिद्धांत - यह बहुत आवश्यक है कि शिक्षण से पूर्व शिक्षक एक निश्चित उद्देश्य को लेकर आगे बढ़े। इसी से सही पाठ्य सामग्री का चयन कर बच्चों को निश्चित समय में निर्धारित ज्ञान देने का प्रयास सफल हो सकता है। उद्देश्य व्यक्ति केंद्रित और समूह केन्दित कैसे भी हो सकते हैं - जैसे बच्चों कि श्रवण क्षमता का ज्ञान, काव्य पठन का कौशल आदि।
  8. विविधता का सिद्धांत - भारत एक बहुभाषिक देश है और शिक्षक को इस बहुभाषिकता को कठिनाई नहीं अपितु संसाधन के रूप में इस्तेमाल करना चाहिए। विविधता प्रतिभा, शारीरिक क्षमता, विचारों के आधार पर भी हो सकती है। शिक्षक का कर्तव्य है कि वह सभी पक्षों को ध्यान में रखते हुए सही पठन सामग्री का चयन कर एक समावेशी कक्षा का आयोजन करने में समर्थ हो, जहाँ हर प्रकार के छात्रों को भाषा सीखने के सामान अवसर मिलें।
  9. अनुपात एवं क्रम का सिद्धांत - भाषा कौशल विशेषतः चार प्रकार के होते हैं - सुनना, बोलना, पढ़ना और लिखना। सही कौशलों का सही से क्रमबद्ध एवं साथ -साथ विकास होना बहुत आवश्यक है। एक कौशल में कमी हो, तो भाषा विकास अधूरा ही माना जाएगा। भाषा शिक्षण का मूल उद्देश्य छात्रों में सभी भाषा कौशलों में निपुणता हासिल करवाना है, जिससे वे भाषा का प्रभावी और संदर्भयुक्त प्रयोग कर सकें।
  10. बोलचाल का सिद्धांत - इसके अनुसार बातचीत के माध्यम से भाषा सरलता और स्थायी रूप से सीखी जाती है, जो लम्बे समय तक याद रहती है। यह भाषा के व्यावहारिक पक्ष पर केंद्रित है। सामजिक अंतःक्रिया द्वारा भाषा प्रयोग के सही सन्दर्भ में अधिकाधिक अवसर मिलते हैं और एक समृद्ध परिवेश की उपलब्धता होती है।
  11. चयन का सिद्धांत - भाषा शिक्षण हेतु यह सिद्धांत अति महत्वपूर्ण है। कक्षा में किस प्रकार के छात्रों को कब, क्या और कैसे पढ़ना है, इसमें सही विधि, समय, पठन सामग्री और विषय का चयन बहुत महत्त्व रखता है। शिक्षक को हर समय मूल्यांकन करते रहना चाहिए कि कौनसी विधि सही काम कर रही है और बच्चों की आवश्यकताओं के अनुसार सही दृश्य-श्रव्य सामग्री उपलब्ध है या नहीं।
  12. बाल केन्द्रितता का सिद्धांत - शिक्षक को यह समझना होगा कि शिक्षण के केंद्र में छात्र है। उसी के शिक्षण हेतु सभी प्रयास किये जा रहे हैं। इसलिए छात्र वर्ग की रूचि, उसका मानसिक स्तर, उसकी विशेष आवश्यकताओं, स्वभाव, विशेषताओं आदि का ज्ञान होना शिक्षण को सही दिशा प्रदान करता है। पठन सामग्री और विधि का चयन उसी आधार पर होना चाहिए।
  13. शिक्षण सूत्रों का सिद्धांत - भाषा की शिक्षा देने के लिए शिक्षक कई विधियां या सूत्र अपनाता है, जैसे - सरल से जटिल की ओर, विशेष से सामान्य की ओर, ज्ञात से अज्ञात की ओर, अंश से पूर्ण की ओर आदि। छात्रों की विविधता और आवश्यकताओं तथा चयनित विषय की गंभीरता को देखते हुए सही सूत्र का चयन बहुत महत्वपूर्ण रहता है।
  14. साहचर्य(संगति) का सिद्धांत - बच्चे सर्वप्रथम भाषा अपने परिवार और समाज अर्थात अपनी संगति से सीखते हैं। इसलिए यह बहुत आवश्यक है कि बच्चों को भाषा सीखने के लिए एक समृद्ध भाषिक परिवेश मिले, जिससे अपने हर तरह भाषा का प्रयोग होते देख बच्चा सहज रूप से भाषा को अधिक सीखने लगेगा। और सही संगति से भाषा के मानक रूप को भी सीखने में सक्षम होगा। यह संगति व्यक्ति, वस्तु (चार्ट, पुस्तक) या पर्यावरण किसी भी प्रकार की हो सकती है।
  15. विभाजन का सिद्धांत - इसके अनुसार शिक्षक को ध्यान रखना चाहिए की चयनित पाठ को छोटे भागों में विभाजित कर बच्चों को एक-एक करके पढ़ाया जाए, जिससे बच्चे सरलता से उसे समझकर आगे बढ़ सकें। यह सिद्धांत सरल से जटिल के शिक्षण सूत्र को पोषित करता है।
  16. पुनरावृति का सिद्धांत - यह अभ्यास को सबसे महत्वपूर्ण मानते हुए शिक्षक को निर्देश देता है कि पढ़े गए पाठ या विषय की सही अंतराओं पर लिसिद्धांतखित-मौखिक परीक्षाओं या कक्षा सहगामी क्रियाओं द्वारा पुनरावृत्ति होते रहने से बच्चे का भाषा अधिगम अधिक सुदृढ़ होता है और उसके विचारों और ज्ञान में परिपक्वता भी आती है।
एक भाषा शिक्षक के रूप में आपका कर्तव्य होता है कि भाषा की शिक्षण प्रक्रिया को अधिक प्रभावी, रुचिकर बनाने हेतु तथा शिक्षार्थियों की अधिकाधिक प्रतिभागिता प्राप्त करने हेतु इन सभी सिद्धांतों को बहुत सही से प्रयोग में लाना चाहिए। ये सभी शिक्षण को सही दिशा प्रदान करने के साथ -साथ शिक्षण में आने वाली अपरिचित कठिनाइयों का हल ढूंढ़ने में भी शिक्षक के लिए बहुत सहायक सिद्ध हो सकते हैं। 

Monday, April 6, 2020

भारत में पायी जाने वाली मृदाएं

मृदा शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के शब्द सोलम (Solum) से हुई है | जिसका अर्थ है फर्श (floor) | मृदा,  पृथ्वी को एक पतले आवरण में ढके रहती है तथा जल और वायु की उपयुक्त मात्रा के साथ मिलकर पौधों को जीवन प्रदान करती है | भारत में सबसे अधिक (43.4%) भूभाग पर जलोढ़ मिट्टी पायी जाती है और अन्य मिट्टियों में काली मिट्टी, लाल मिट्टी और लैटराइट मिट्टी पायी जाती है |

भारत में पायी जाने वाली प्रमुख मृदाएँ इस प्रकार हैं :

1. जलोढ़ मिट्टी (Alluvial Soil): इस मिट्टी का विस्तार लगभग 15 लाख वर्ग किमी. है| भारत में सबसे अधिक (43.4%) भूभाग पर जलोढ़ मिट्टी पायी जाती है | यह उत्तर भारत के मैदानों तथा दक्षिण भारत के तटीय मैदानों की मिट्टी है जो मुख्यतः नदियों द्वारा वाहित होती है | इस मृदा में पोटाश व चूना प्रचुर मात्रा में पाया जाता है तथा फास्फोरस, नाइट्रोजन एवं जीवांश की कमी होती है | यह मिट्टी गन्ना, गेहूं, धान, तिलहन, दलहन आदि की खेती के लिए बहुत ही उपजाऊ होती है |

2. लाल मिट्टी (Red Soil):  इस मिट्टी का विस्तार मुख्य तौर से तमिलनाडु, कर्नाटक, दक्षिण पूर्वी महाराष्ट्र, ओडिशा, पूर्वी मध्य प्रदेश, बुन्देलखंड के कुछ भागों में तथा छोटा नागपुर में है | इस मृदा का विस्तार देश के 18.6% भूभाग पर है | इस प्रकार यह देश में पायी जाने वाली दूसरी सबसे अधिक विस्तृत क्षेत्र वाली मृदा है | इसका निर्माण ग्रेनाइट, नीस और सिस्ट जैसे खनिजों से होता है | इसमें लोहे का अंश सबसे अधिक होता है | इसमें पैदा की जाने वाली फसलें तम्बाकू, बाजरा, तिलहन और गेहूं हैं |

3. मरुस्थलीय मिट्टी (Desert Soil): ये मृदाएँ शुष्क तथा आर्द्र शुष्क प्रदेशों में पायी जाती हैं इस प्रकार की मृदाएँ मुख्य रूप से राजस्थान, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, दक्षिणी पंजाब के भागों में पायीं जातीं हैं | इस प्रकार यह मिट्टी 2.85 लाख किमी2 भूभाग में फैली है| पानी की कमी और अधिक तापमान के कारण ये मृदाएँ टूटकर बालू के कणों में विखंडित हो जातीं हैं | इसमें फास्फोरस अधिक मात्रा में पाया जाता है लेकिन इनमे जीवांश ईधन और नाइट्रोजन की कमी होती है |

4. पर्वतीय मृदाएँ (Hill Soil): इसका विस्तार भारत में लगभग 3 लाख वर्ग किमी में पाया जाता है | इसे वनीय मृदा भी कहते हैं | इस प्रकार की मिट्टियाँ कश्मीर से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक फैली हई है | इसमें जीवांश अधिक मात्रा में पाये जाते हैं लेकिन फास्फोरस, पोटाश, चूना की कमी होती है | यह मृदा सेव, नाशपाती और अलूचा आदि के लिए अच्छी मानी जाती है |

5. मरुस्थलीय मिट्टी (Desert Soil): ये मृदाएँ शुष्क तथा आर्द्र शुष्क प्रदेशों में पायी जाती हैं इस प्रकार की मृदाएँ मुख्य रूप से राजस्थान, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, दक्षिणी पंजाब के भागों में पायीं जातीं हैं | इस प्रकार यह मिट्टी 2.85 लाख किमी2 भूभाग में फैली है| पानी की कमी और अधिक तापमान के कारण ये मृदाएँ टूटकर बालू के कणों में विखंडित हो जातीं हैं | इसमें फास्फोरस अधिक मात्रा में पाया जाता है लेकिन इनमे जीवांश ईधन और नाइट्रोजन की कमी होती है |

6. पर्वतीय मृदाएँ (Hill Soil): इसका विस्तार भारत में लगभग 3 लाख वर्ग किमी में पाया जाता है | इसे वनीय मृदा भी कहते हैं | इस प्रकार की मिट्टियाँ कश्मीर से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक फैली हई है | इसमें जीवांश अधिक मात्रा में पाये जाते हैं लेकिन फास्फोरस, पोटाश, चूना की कमी होती है | यह मृदा सेव, नाशपाती और अलूचा आदि के लिए अच्छी मानी जाती है |

Thursday, April 2, 2020

IMPORTANT_DAYS_AND_DATES

■ # राष्ट्रीय व अंतरर्राष्ट्रीय महत्त्वपूर्ण दिवस  ■

👉#IMPORTANT_DAYS_OF_JANUARY✅
9 January – भारतीय प्रवासी दिवस
12 January – National Youth Day(राष्ट्रीय युवा दिवस)
15 January – Indian Army Day(थल सेना दिवस)
24 January – National Girl Child Day (राष्ट्रीय बालिका दिवस)
26 January – RePublic Day(गणतंत्र दिवस)
30 January – शहीद दिवस

👉#IMPORTANT_DAYS_OF_FEBRUARY✅
1 February – World Cancer (विश्वकैंसर दिवस)
21 February – अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस
24 February – केंद्रीय उत्पाद शुल्क दिवस
28 February – National Science Day (राष्ट्रीय विज्ञान दिवस)

👉#IMPORTANT_DAYS_OF_MARCH✅
4 March – National Security Day(राष्ट्रीय सुरक्षा दिवस)
8 March – International Women Day (अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस)
15 March – World Consumer Rights Day (विश्व उपभोक्ता अधिकार दिवस)
21 March – विश्व वानिकी दिवस
22 March – विश्व जल सरंक्षण दिवस
23 March – भगत सिंह ,राजगुरु एवम सुखदेव के शहीद दिवस
23 March – विश्व मौसम विज्ञान दिवस
24 March – World T. B. Day(विश्व टी. बी. दिवस)
24 March – ग्रामीण डाक जीवन बीमा दिवस
26 March – बांग्लादेश का राष्ट्रीय दिवस
27 March – विश्व थियेटर(रंगमंच) दिवस

👉#IMPORTANT_DAYS_OF_APRIL✅
7 April – विश्व स्वास्थ्य दिवस
14 April – अम्बेडकर जयंती
18 April – विश्व विरासत दिवस
22 April – World Earth Day(विश्व पृथ्वी दिवस)
23 April – विश्व पुस्तक एवं कॉपीराइट दिवस

👉#IMPORTANT_DAYS_OF_MAY✅

1 May – विश्व श्रमिक दिवस (World Labour Day)
3 May – विश्व प्रेस स्वतन्त्रता दिवस
8 May – विश्व प्रवासी पक्षी दिवस
8 May – विश्व रेडक्रोस दिवस
11 May – राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस
12 May – विश्व नर्स दिवस
15 मई – विश्व परिवार दिवस
17 May – विश्व दूरसंचार दिवस
18 May – विश्व संग्रहालय दिवस
31 May – विश्व तम्बाकू रोधी दिवस

👉#IMPORTANT_DAYS_OF_JUNE✅
5 June – विश्व पर्यावरण दिवस
14 June – विश्व रक्तदान दिवस
21 June – InterNational Yoga Day (अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस)
23 June – International Olympic Day (अंतर्राष्ट्रीय ओलंपिक दिवस)
29 June – राष्ट्रीय सांख्यिकी दिवस

👉#IMPORTANT_DAYS_OF_JULY✅
 1 July –  भारतीय स्टेट बैंक की स्थापना दिवस
 1 July -चिकित्सक दिवस
11 July – विश्व जनसंख्या दिवस
24 July – आयकर दिवस
26 July – कारगिल स्म्रति दिवस

👉#IMPORTANT_DAYS_OF_AUGUST✅
1 August – विश्व स्तनपान दिवस
9 August – विश्व आदिवासी दिवस
12 August – विश्व युवा दिवस
15 August – INDEPENDENCE DAY(स्वतंत्रता दिवस)
29 अगस्त – राष्ट्रीय खेल दिवस (मेजर ध्यानचंद की स्मृति में)

👉#IMPORTANT_DAYS_OF_SEPTEMBER✅
5 September – शिक्षक दिवस ( राधाकृष्णन के जन्म दिन पर)
8 September – (World Literacy Day)विश्व साक्षरता दिवस
14 September – हिंदी दिवस
14 September – विश्व बंधुत्व एवं क्षमायाचना दिवस
16 September – ओजोन परत रक्षण दिवस
20 September – RPF की स्थापना दिवस
21 September – विश्व शान्ति दिवस
27 September – विश्व पर्यटन दिवस

👉#IMPORTANT_DAYS_OF_OCTOBER✅
1 October – अन्तर्राष्ट्रीय वर्द्धजन दिवस
2 October – लाल बहादुर शास्त्री जयंती
2 October – अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस
3 October – विश्व प्रकृति दिवस
4 October – विश्व पशु कल्याण दिवस
5 October – विश्व परिवेश दिवस
5 October – विश्व शिक्षक दिवस
6 October – विश्व वन्य प्राणी दिवस
8 October – वायु सेना दिवस
9 October – विश्व डाक दिवस
14 October – विश्व मानक दिवस
16 October – विश्व एलर्जी जागरूकता दिवस
16 अक्टूबर – विश्व खाद्य दिवस
24 October – संयुक्त राष्ट्र दिवस
30 October – विश्व मितव्ययिता दिवस

👉#IMPORTANT_DAYS_OF_NOVEMBER✅
9 November – विश्व सेना दिवस
9 November – राष्ट्रीय विधिक साक्षरता दिवस
14 November – बाल दिवस
14 November – विश्व मधुमेह दिवस
17 November – विश्व विद्यार्थी दिवस
17 November – राष्ट्रीय पत्रकारिता दिवस
18 November – विश्व वयस्क दिवस
19 November – विश्व नागरिक दिवस
19 November – विश्व शौचालय दिवस
21 November – विश्व टेलीविजन दिवस
26 November – विश्व पर्यावरण संरक्षण दिवस
26 November – राष्ट्रीय विधि दिवस

👉#IMPORTANT_DAYS_OF_DECEMBER✅
1 December – विश्व एड्स दिवस
3 December – अंतर्राष्ट्रीय विकलांगता जन दिवस
4 December – नौ सेना दिवस
5 December – अंतर्राष्ट्रीय स्वयंसेवक दिवस
6 December – नागरिक सुरक्षा दिवस
7 December – झंडा दिवस(सशश्त्र बलो का )
10 December – अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस
11 December – विश्व बाल कोष दिवस
23 December – किसान दिवस (चौधरी चरण सिंह का जन्मदिन)
24 December – राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस

Monday, March 9, 2020

देश और उनकी राजधानी मुद्रा

🇮🇳भारत --- दिल्ली -- रुपया

🇵🇰पाकिस्तान--इस्लामाबाद--रुपया

🇳🇵नेपाल--कांठमांडू--रुपया

🇱🇰श्रीलंका--कोलम्बो--रुपया

🇧🇩बांग्लादेश--ढाका--टका

🇧🇹भूटान--थिम्पू--नगुल्ट्रम

🇲🇲म्यांमार--ने-पिताओ--क्यात

🇦🇫अफ़ग़ानिस्तान--काबुल--अफगानी

🇨🇳चीन--बीजिंग--युआन

🇲🇳मंगोलिया--उलानबटोर--तुगरिक

🇯🇵जापान--टोक्यो--येन

 🇹🇼ताइवान--ताइपे--डॉलर

🇹🇭थाईलैंड--बैंकॉक--थाईबेहत

🇻🇳वियतनामहनोईडाँग

🇰🇭कम्बोडिया--नामपेन्ह--रिएल

🎯उतरी कोरिया--प्योंगयांग--वॉन

🎯दक्षिण कोरिया--सियोल--वॉन

🇭🇰हॉंग कांग--विक्टोरिया--डॉलर

🇵🇭फिलीपींस--मनीला--पेसो

🇸🇬सिंगापुर--सिंगापुर--सिंगापुरी डॉलर

🇵🇱इंडोनेशिया--जकार्ता--रुपया

🇲🇾मलेशिया--क्वालालम्पुर--रिन्ग्गिट

🎯ईरान---तेहरान---रियाल

🇮🇶इराक--बगदाद--इराकी दिनार

🇹🇷तुर्की---अंकारा---लीरा

🇦🇪संयुक्त अरब अमीरात--आबूधाबी--दिरहम

🇸🇦सऊदी अरब--रियाद--सऊदी रियाल

🇰🇼कुवैत---कुवैत सिटी---कुवैती दिनार

🇸🇾सीरिया---दमिश्क--सीरियन पॉउण्ड

🇱🇧लेबनान---बेरुत--पाउंड

Thursday, February 27, 2020

Ctet and uptet special question part-3

प्रश्‍न 1- नगरों में पर्यावरण असंतुलन होता है। 
उत्‍तर - मल निकासी से, आवासीय समस्‍या से एवं जलाऊ लकड़ी से। 



प्रश्‍न 2- पर्यावरण हास का पर्यायवाची है। 
उत्‍तर - पर्यावरण अवनयन, पर्यावरण निम्‍नीकरण एवं पर्यावरण अपकर्षण । 


प्रश्‍न 3- पर्यावरण हास होता है। 
उत्‍तर - प्राकृतिक प्रकोप से, प्राकृतिक आपदा एवं पर्यावरण आघात। 


प्रश्‍न 4- मरूस्‍थलीयकरण में पर्यावरण होता है। 
उत्‍तर - असंतुलित । 


प्रश्‍न 5- पर्यावरणीय संरक्षण का अभिप्राय है। 
उत्‍तर - प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण। 


प्रश्‍न 6- पर्यावरण का प्रत्‍येक भाग कहलाता है। 
उत्‍तर - पारिस्थितिकी कारक । 


प्रश्‍न 7- पारिस्थितिकी तंत्र किससे मिलकर बनता है। 
उत्‍तर - जीवीय समुदाय और उसके निर्जीव घटक। 


प्रश्‍न 8- पारिस्थितिकी विज्ञान केन्‍द्र कहॉ स्थित है। 
उत्‍तर - पुणे । 


प्रश्‍न 9- डार्विन का उद्विकास का सिद्धांत आधारित है। 
उत्‍तर - उत्‍परिर्वन। 


प्रश्‍न 10- पारिस्थितिकम शब्‍द को परिभाषित करने वाले पर्यावरणविद् है। 
उत्‍तर - अन्‍स्‍ट हैकेल। 


प्रश्‍न 11- भारत में वनस्‍पति एवं जन्‍तुओं की सर्वाधिक विविधता कहॉ पाई जाती है। 
उत्‍तर - पश्चिमी घाट में । 


प्रश्‍न 12- आवास के जैविक घटक है। 
उत्‍तर - समस्‍त जीव । 


प्रश्‍न 13- बगुला एवं भेसों का अन्‍योन्‍याश्रय सम्‍बन्‍ध कहलाता है। 
उत्‍तर - सहभागिता । 


प्रश्‍न 14- किसी भी आवास में सफल जीवन यापन हेतु उपयुक्‍त लक्षण है। 
उत्‍तर - अनुकूलन । 


प्रश्‍न 15- एक पोधे पर दूसरा उगने वाला पौधा कहलाता है। 
उत्‍तर - एपीफाइट । 


प्रश्‍न 16- विश्‍व पर्यावरण दिवस कब मनाया जाता है। 
उत्‍तर - 5 जून को । 


प्रश्‍न 17- ऑस्‍ट्रेलिया के मूल निवासियों को किस नाम से जाना जाता है। 
उत्‍तर - एबोर्जिन्‍स । 


प्रश्‍न 18- एस्किमों लोगों द्वारा टुण्‍डा क्षेत्र में बर्फ के टुकड़ों की सहायता से बनाए गए अर्द्ध गोलाकार आवासों को क्‍या कहा जाता है। 
उत्‍तर - इग्‍लू । 


प्रश्‍न 19- एस्किमों लोगों का ग्रीष्‍मकालीन निवास गृह क्‍या कहलाता है। 
उत्‍तर - ट्यूपिक । 


प्रश्‍न 20- ऐसा जीव सम्‍बन्‍ध, जिसमें सम्‍बन्धित जीव परस्‍पर लाभान्वित होते है। कहलाता है। 
उत्‍तर - सहोपकारिता । 


प्रश्‍न 21- स्‍पाइरोगाइरा, हाइड्रिला एवं यूलोथ्रिक्‍स है। 
उत्‍तर - जलोद्भि । 



प्रश्‍न 22- अम्‍ल वर्षा में कौन सा अम्‍ल उपस्थित होता है। 
उत्‍तर - नाइट्रस अम्‍ल । 


प्रश्‍न 23- हाइड्रोफाइटस होते है। 
उत्‍तर - समुद्री जीव । 


प्रश्‍न 24- लवणता को प्रति, समुद्र जल में घुले नमक (ग्राम) की मात्रा से व्‍यक्‍त किया जाता है। 
उत्‍तर - 1000 ग्राम । 


प्रश्‍न 25- कुछ पर्वतों पर हमेशा जमी रहने वाली बर्फ की नदियॉ होती है, उन्‍हें ............ कहा जाता है। 
उत्‍तर - हिमानी । 


प्रश्‍न 26- भू - दृश्‍य पर जल, पवन एवं हिम जैसे विभिन्‍न घटकों के द्वारा होने वाले क्षय को ............... कहते है। 
उत्‍तर - अपरदन । 


प्रश्‍न 27- समुद्र तक पहुँचते पहॅुचते नदी का प्रवाह धीमा हो जाता है तथा नदी अनेक धाराओं में विभाजित हो जाती है, जिनको ............. कहा जाता है। 
उत्‍तर - वितरिका । 


प्रश्‍न 28- समुद्री जल के ऊपर लगभग ऊर्ध्‍वाधर उठे हुए ऊँचे शैलीय तटों को ............ कहते है। 
उत्‍तर - समुद्र भृगु । 


प्रश्‍न 29- महासागरों की औसत लवणता कितनी होती है। 
उत्‍तर - 35 भाग प्रति हजार ग्राम । 


प्रश्‍न 30- विश्‍व जल दिवस कब मनाया जाता है। 
उत्‍तर - 22 मार्च को । 


प्रश्‍न 31- पूर्णिमा एवं अमावस्‍या के दिनों में सूर्य, चन्‍द्रमा एंव पृथ्‍वी तीनों एक सीध में होते है और इस समय सबसे ऊँचे ज्‍वार उठते है । इस ज्‍वार को क्‍या कहते है। 
उत्‍तर - वृहत् ज्‍वार । 


प्रश्‍न 32- ............... मछली पकड़ने में भी मदद करते है। 
उत्‍तर - उच्‍च ज्‍वार । 


प्रश्‍न 33- भार के अनुपात में जल में हाइड्रोजन व ऑक्‍सीजन का अनुपात होता है। 
उत्‍तर - 1:8 । 


प्रश्‍न 34- शुद्ध जल का पी एच मान होता है। 
उत्‍तर - 7 । 


प्रश्‍न 35- पानी का घनत्‍व किस तापमान पर अधिकतम होता है। 
उत्‍तर - 4 डिग्री सेल्सियस पर । 


प्रश्‍न 36- बहता जल मृत्तिकायुक्‍त मृदाओं को काटते हुए गहरी वाहिकाऍ बनाता है। जिन्‍हें ............... कहते है। 
उत्‍तर - अवनलिकाऍ । 


प्रश्‍न 37- पानी का शुद्धतम रूप है। 
उत्‍तर - वर्षा का जल । 


प्रश्‍न 38- विश्‍व के लगभग कितने प्रतिशत भू भाग पर जल है। 
उत्‍तर - 71 प्रतिशत पर । 


प्रश्‍न 39- मृत सागर क्‍या है। 
उत्‍तर - ऐसा सागर जो सभी महासागरों व सागरों से ज्‍यादा नमकीन है। 


प्रश्‍न 40- पोटैशियम परमैंगनेट जल को बना देता है। 
उत्‍तर - कीटाणु रहित । 


प्रश्‍न 41- पक्षी अपनी गर्दन बहुत हिलाते है। इसका कारण है। कि 
उत्‍तर - पक्षियों की ऑखों की पुतली घूम नहीं सकती । 



प्रश्‍न 42- बिहार राज्‍य के लोगो के लिए मधुमक्‍खी पालन शुरू करने की सबसे अच्‍छी अवधि कौन सी होती है। 
उत्‍तर - अक्‍टूबर से दिसम्‍बर । 


प्रश्‍न 43- कुछ पक्षी मानव की तुलना में चार गुना अधिक दूरी तक देख सकते है। ये पक्षी है। 
उत्‍तर - चील, बाज, गिद्ध । 


प्रश्‍न 44- मांसपेशियों की सुचारू क्रिया के लिए .............. खनिज की पर्याप्‍त मात्रा में आवश्‍यक होती है। 
उत्‍तर - लौह एवं आयोडीन । 


प्रश्‍न 45- पकाने से पहले चावल को अधिक मात्रा वाले पानी से कई बार धाने से क्‍या नष्‍ट हो जाता है। 
उत्‍तर - सतही प्रोटीन । 


प्रश्‍न 46- एक ही तरह की फसल बार - बार उगाने और बहुत से रसायनों का उपयोग करने से मृदा पर क्‍या प्रभाव पड़ता है। 
उत्‍तर - बंजर हो जाती है। 


प्रश्‍न 47- यह देखा गया है कि पाचन क्रिया बाहर की अपेक्षा आमाश्‍य के अन्‍दर अधिक तेजी से होती है, क्‍योकि ।
उत्‍तर - आमाश्‍य के अन्‍दर भोजन का मंथन होता रहता है जिससे उसकी सतह का क्षेत्रफल बढ़ जाता है और एन्‍जाइम की क्रिया तेज होती है। 


प्रश्‍न 48- भारोत्‍तोलकों को प्राय: ज्‍यादा मांसपेशियॉ और बॉडी मास बनाने की आवश्‍यकता होती है। इस उद्देश्‍य के लिए, उन्‍हें ऐसा आहार लेने की आवश्‍यकता है, जो ............से भरपूर हो । 
उत्‍तर - प्रोटीन । 


प्रश्‍न 49- एक किसान दानों को भूसे से अलग करना चाहता है जिस प्रकार से यह किया जा सकता है वह कहलाती है।
उत्‍तर - निष्‍पावन । 


प्रश्‍न 50- भोजन से हमे ऊर्जा प्राप्‍त होती है। इस ऊर्जा के लिए मुख्‍य रूप से भोजन का कौन सा अवयव उत्‍तरदायी होता है। 
उत्‍तर - वसा । 


प्रश्‍न 51- दूध को पीने से पहले उबाल लेना चाहिए, क्‍योकि 
उत्‍तर - उबालने से बहुत से रोगाणु नष्‍ट हो जाते है। 


प्रश्‍न 52- विटामिन वी1 की कमी से होने वाले रोग बेरी बेरी का प्रमुख लक्षण क्‍या है। 
उत्‍तर - अस्थियों का मुलायम होकर मुड जाना । 


प्रश्‍न 53- विटामिन सी का रासायनिक नाम है। 
उत्‍तर - एस्‍कॉर्बिक एसिड । 


प्रश्‍न 54- अन्‍न समुद्ध स्‍त्रोत होते है। 
उत्‍तर - स्‍टार्च के । 


प्रश्‍न 55- अरक्‍तता किसकी कमी से होती है। 
उत्‍तर - आयरन से । 


प्रश्‍न 56- भोजन का अनिवार्य अवयव है। 
उत्‍तर - कार्बोहाइड्रेट । 


प्रश्‍न 57- जिस भोजन में कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा, खनिज लवण, विटामिन ओर जल आदि सभी समुचित अनुपात में हो, तो उसे सन्‍तुलित भोजन कहते है। समान्‍यत: हम सन्‍तुलित भोजन में प्रोटीन किस रूप में ग्रहण करते है। 
उत्‍तर - दाल । 


प्रश्‍न 58- दॉतों और हड्डियों के विकास के लिए कैल्शियम की आवश्‍यकता होती है। कैल्शियम के साथ साथ कौन सा तत्‍व हड्डियों के विकास में सहायक होता है। 
उत्‍तर - फॅास्फोरस । 


प्रश्‍न 59- हृदय की धड़कन नियन्त्रित करने के लिए कौन सा खनिज आवश्‍यक है। 
उत्‍तर - पोटैशियम । 


प्रश्‍न 60- निदान के पश्‍चात कोई डॉक्‍टर रोगी से यह कहता है कि उसके खून में हीमोग्‍लोबिन की कमी है, तो उस रोगी को आयरन की कमी को पूरा करने के लिए क्‍या क्‍या करना चाहिए। 
उत्‍तर - ऑवला, हरी पत्‍तेदार सब्जियॉ , गुड । 


प्रश्‍न 61- जीवों के पारिस्थितिक कारकों का योग पर्यावरण है। यह कथन किसका है। 
उत्‍तर - ए. फिटिंग । 



प्रश्‍न 62- पर्यावरणीय निश्‍चयवाद के प्रतिपादक कौन थे। 
उत्‍तर - कार्ल रिटर । 


प्रश्‍न 63- संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ ने वर्ष 2002 को किसका अंतर्राष्‍ट्रीय वर्ष घोषित किया है। 
उत्‍तर - सतत् विकास का। 


प्रश्‍न 64- विश्‍व पर्यावरण दिवस कौन सी तारीख को मनाया जाता है। 
उत्‍तर - 5 जून । 


प्रश्‍न 65- पर्यावरण का सन्‍तुलन बनाये रखने के लिए वनान्‍तर्गत क्षेत्रफल होना चाहिए। 
उत्‍तर - 33 प्रतिशत। 


प्रश्‍न 66- किसी क्षेत्र में पेड़ो के उगने के लिए अपेक्षित न्‍यूनतम तापमान है। 
उत्‍तर - 4 डिग्री सेल्सियस। 


प्रश्‍न 67- भारत में वन अनुसंस्‍थान कहॉ स्थित है। 
उत्‍तर - देहरादून । 


प्रश्‍न 68- वनरोपण प्रक्रिया है। 
उत्‍तर - ज्‍यादा पेड़ लगाने की। 


प्रश्‍न 69- भारत में अधिकतम वनाच्‍छादन क्षेत्र कौन सा है। 
उत्‍तर - आरक्षित वन । 


प्रश्‍न 70- हरा सोना किसे कहा जाता है।
उत्‍तर - वन को। 


प्रश्‍न 71- भारत में अधिकांश वन संपदा का मालिक कौन है। 
उत्‍तर - राज्‍य। 



प्रश्‍न 72- वन महोत्‍सव किससे संबंधित है। 
उत्‍तर - पेड़ लगाना। 


प्रश्‍न 73- सोपान कृषि कहॉ की जाती है। 
उत्‍तर - पहाड़ो के ढलान पर। 


प्रश्‍न 74- पर्यावरण अध्‍ययन की प्रकृति है। 
उत्‍तर - बहु अनुशासनिक। 


प्रश्‍न 75- हम चारो ओर जिन दशाओं से घिरे हुए है, उनका योग कहलाता है। 
उत्‍तर - पर्यावरण। 


प्रश्‍न 76- वैश्विक पर्यावरण के लिए सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण वन है। 
उत्‍तर - उष्‍ण कटिबंधीय वन। 


प्रश्‍न 77- पर्यावरण उन बहारी दशाओं और प्रभावों का योग है जो पृथ्‍वी तल पर जीवों के विकास चक्र को प्रभावित करते है। यह कथन है। 
उत्‍तर - निकोलस । 


प्रश्‍न 78- पर्यावरण एक बाह्य शक्ति है जो कि हमें प्रभावित करती है। यह कथन है। 
उत्‍तर - सी. सी. पार्क । 


प्रश्‍न 79- विश्‍व में पर्यावरण जागरूकता की शुरूआत की थी। 
उत्‍तर - विलियम हैवेट । 


प्रश्‍न 80- पर्यावरण का जैविक कारक है। 
उत्‍तर - वनस्‍पति। 


प्रश्‍न 81- पर्यावरण में सम्मिलित है। 
उत्‍तर - जलमण्‍डल, वायुमण्‍डल एवं स्‍थलमण्‍डल 



प्रश्‍न 82- पर्यावरण अध्‍ययन की प्रकृति है। 
उत्‍तर - बहु अनुशासनिक। 


प्रश्‍न 83- रंग पर्यावरण और स्‍वास्‍थ पर्यावरणीय शिक्षा की एक प्रमुख विधि है जो आधारित है। 
उत्‍तर - प्रदर्शनी पर। 


प्रश्‍न 84- पर्यावरण एक अविभाज्‍य समृष्टि है जिनकी रचना होती है। 
उत्‍तर - भौतिक, जैविक एवं सांस्‍कृतिक तत्‍वों वाले पारस्‍परिक क्रियाशील तंत्रों से। 


प्रश्‍न 85- पर्यावरणीय निश्‍चयवाद के प्रतिपादक कौन है। 
उत्‍तर - कार्ल रिटर । 


प्रश्‍न 86- प्रभावकारी दशाओं का वह संपूर्ण योग जिसमें जीव रहते है कहलाता है। 
उत्‍तर - पर्यावरण। 


प्रश्‍न 87- पर्यावरण के घटको में आप किसे शामिल करेगें। 
उत्‍तर - जल, वायु एवं मृदा। 


प्रश्‍न 88- पर्यावरण के प्रमुख कारकों में निम्‍नलिखित में से कौन सा कारक सम्मिलित है। 
उत्‍तर - जलवायु, भौगोलिक स्थिति एवं वनस्‍पति । 


प्रश्‍न 89- भौगोलिक अध्‍ययन में कितने प्रकार के पर्यावरण शामिल है। 
उत्‍तर - दो। 


प्रश्‍न 90- पर्यावरण को ऊर्जा प्राप्‍त होती है। 
उत्‍तर - सर्य से। 


प्रश्‍न 91- नेपेन्थिस एक ऐसा पौधा है जो मेढ़को कीडो मकोडो और चूहों जैसे छोटे जीवों को अपने अन्‍दर फांस कर खा जाता है। हमारे देश में यह पौधा पाया जाता है। 
उत्‍तर - मेघालय में । 



प्रश्‍न 92- ............ के लिए मछलीघर में हवा वाला पम्‍प रखा जाता है। 
उत्‍तर - अधिक ऑक्‍सीजन को पानी में घुलने के लिए । 


प्रश्‍न 93- विश्‍व जैव विविधता संरक्षण से सम्‍बन्धित है। 
उत्‍तर - नगोया प्रोटोकॉल । 


प्रश्‍न 94- सर्वाधिक जातिगत विविधता कहॉ पाई जाती है। 
उत्‍तर - विषुवतरेखीय सदाबहार वन । 


प्रश्‍न 95- सबसे कम जैव विविधता किस महाद्वीप में पाई जाती है। 
उत्‍तर - अफ्रीका में । 


प्रश्‍न 96- ग्रेट इण्डियन बस्‍टर्ड है। 
उत्‍तर - संकटग्रस्‍त जाति । 


प्रश्‍न 97- साइलेन्‍ट वैली के चर्चित होने का कारण है। 
उत्‍तर - जैव विविधता । 


प्रश्‍न 98- ओरण किसे कहते है। 
उत्‍तर - पवित्र वन को । 


प्रश्‍न 99- घाना पक्षी बिहार किस राज्‍य में स्थित है। 
उत्‍तर - राजस्‍थान में । 


प्रश्‍न 100- फूलो की घटी कहॉ स्थित है।
उत्‍तर - गढ़वाल हिमालय में । 

डॉ. जीन पियाजे के सम्पूर्ण अधिगम से संबंधित सिद्धांत

डॉ. जीन पियाजे ( 1896-1980 ) स्विस मनोवैज्ञानिक थे। वे मूल रूप से प्राणी शास्त्री थे, लेकिन उन्होंने मनोविज्ञान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण क...