Monday, September 16, 2019

One linear question for ctet and tet part-1

प्रश्‍न 1- शरीर मे सबसे लम्बी हड्डी का नाम क्या है। 
उत्‍तर - फीमर जो जॉग मे होती है। 


प्रश्‍न 2- शरीर मे सबसे छोटी हड्डी का नाम क्या है। 
उत्‍तर - स्टेपीज जो कान मे होती है । 


प्रश्‍न 3- शरीर मे सबसे मजबूत हड्डी का नाम क्या है। 
उत्‍तर - मण्डीवल जो जबडे मे होती है। 


प्रश्‍न 4- जन्म के समय नवजात शिशु की त्वचा का रंग कैसा होता है। 
उत्‍तर - हल्काम गुलाबी
नोट - 15 दिन के बाद त्वचा स्थाई रंग को प्राप्त कर लेती है। 


प्रश्‍न 5- नवजात शिशु कितने घण्टे सोता है। 
उत्‍तर - 18 से 20 घण्टे किन्तु् वह हर 2 घंण्टे मे जागकर अपनी मासपेसियो को घुमाता है। 


प्रश्‍न 6- बालक का विकास 6 बर्ष तक लगभग कितने प्रतिशत हो जाता है। 
उत्‍तर - 90 प्रतिशत ! 


प्रश्‍न 7- बालक का विकास 10 वर्ष तक लगभग कितने प्रतिशत हो जाता है। 
उत्‍तर - 95 प्रतिशत ! 


प्रश्‍न 8- बाल्य अवस्था में बालक की हड्डियॉ कितनी होती है। 
उत्‍तर - बाल्य अवस्था में बालक की हड्डियों की संख्या 270 से 350 तक हो जाती है। 


प्रश्‍न 9- नि:शुल्क एवं बाल शिक्षा का अधिकार एवं अधिनियम 2009 का विस्तार किस राज्य मे नही हुआ । 
उत्‍तर - जम्बू कश्मी‍र ! 


प्रश्‍न 10- शिक्षा का अधिकार 2009 के तहत निजी विद्यालय को कितने प्रतिशत सीट आरक्षित करना अनिवार्य होगा । 
उत्‍तर - 25 प्रतिशत ! 

प्रश्‍न 11- 25 से कम बुद्धि वाला बालक क्या कहलाता है। 
उत्‍तर - जड । 


प्रश्‍न 12- यौन, यदि समस्त जीवन का नही तो किशोरवस्था का अवश्य ही मूल तत्व है। यह किसने कहा। 
उत्‍तर - रॉस ने । 


प्रश्‍न 13- कुशाग्रबुद्धि अथवा प्रतिभावन बालक वह है जो निरन्तर किसी भी उचित कार्यक्षेत्र में अपनी अद्भुत कार्यकुशलता अथवा प्रवीणता का परिचय देता है। यह कथन किसका है। 
उत्‍तर - हैविंग्हर्स्ट । 


प्रश्‍न 14- पिछडा बालक वह है जो अपने अध्ययन के मध्यकाल में अपनी कक्षा का कार्य, जो उसकी आयु के अनुसार एक कक्षा नीचे का है करने मे असमर्थ रहता है यह किसने कहा । 
उत्‍तर - सिरिल बर्ट ने । 


प्रश्‍न 15- समस्यात्मतक बालक उन बालकों के लिये प्रयोग किया जाता है जिनका व्यवहार अथवा व्‍यक्तित्व‍ किसी बात मे गम्भीर रूप से असमान्य होता है। यह कथन किस मनोवैज्ञानिक का है। 
उत्‍तर - वेलेन्टाइन । 


प्रश्‍न 16- वह बालक जो समाज द्वारा स्वीकृत आचरण का पालन नही करता अपराधी कहलाता है यह किसने कहा। 
उत्‍तर - हीली ने । 


प्रश्‍न 17- बुद्धि के किस सिद्धान्त को बालू का ढेर कहा जाता है। 
उत्‍तर - बहुतत्व सिद्धान्त को । 


प्रश्‍न 18- व्यक्ति के चेहरे को देखकर उसकी बुद्धि का पता लगाया जा सकता है। यह कथन किसका है। 
उत्‍तर - लेवेटर का । 


प्रश्‍न 19- वे शिक्षार्थी जो संवृद्ध ज्ञान और शै‍क्षणिक दक्षता को । हार्दिक इच्छा प्रदर्शित करते है । उनके पास होता है। 
उत्‍तर - निष्पादन उपागम अभिविन्यास । 


प्रश्‍न 20- प्रतिभाशाली बालक वह है जो अपने उत्पा‍दन की मात्रा दर तथा गुणवत्ता् में विशिष्ट होता है। यह कथन दिया गया है। 
उत्‍तर - टर्मन एवं ओडन द्वारा । 


प्रश्‍न 21- 12 वर्ष तक के बालक के मतिष्क का भार कितना होता है । 
उत्‍तर - लगभग 1260 ग्राम जबकि एक स्वास्‍थ्‍य मनुष्य के मतिष्क का भार 1400 ग्राम होता है। 


प्रश्‍न 22- मनुष्य के शरीर में कितनी हड्डियॉ होती है। 
उत्‍तर - 206 हड्डियॉ होती है। जबकि बालक के जन्म के समय बालक में 270 हड्डियॉ होती है एवं बाल्य अवस्था में बालक ही हड्डियॉ 350 होती है। 


प्रश्‍न 23- बालक के विकास की दशा कैसी होती है। 
उत्‍तर - सिर से पैर की ओर । ( इसे केन्द्रा से बाहर की ओर ) और ( सामान्य से विशिष्टा की ओर ) भी कहते है। 


प्रश्‍न 24- विश्लेषणात्मक मनोविज्ञान के जनक कौन है। 
उत्‍तर - सिंगमडफ्रायड । 


प्रश्‍न 25- तूफान की अवस्था किसे कहा जाता है। 
उत्‍तर - किशोर अवस्था् को । 


प्रश्‍न 26- किशोर अवस्था् को तूफान अवस्था किसने कहां । 
उत्‍तर - स्टेनले हाल । 


प्रश्‍न 27- नैतिक विकास का सिद्धान्त किसने दिया। 
उत्‍तर - कोहलवर्ग ने । 


प्रश्‍न 28- मूल प्रवृत्ति का सिद्धान्त किसने दिया। 
उत्‍तर - मैक्डूनल ( 14 मूल प्रवृतियां बताई ) । 


प्रश्‍न 29- संवेग क्या् है 
उत्‍तर - मन की उत्तेजित दशा को संवेग कहते है
जैसे – क्रोध , खुशी 


प्रश्‍न 30- व्यक्तित्व का स्व: सिद्धान्त किसने दिया। 
उत्‍तर - कार्लरोजर ने ! 


प्रश्‍न 31- वह स्तर जिसमें बच्चा् किसी वस्तु एवं घटना के बारे में तार्किक रूप से सोचना शुरू करता है उसे कौन सी अवस्था कहा जाता है । 
उत्‍तर - मूर्त क्रियात्मक अवस्था । 


प्रश्‍न 32- सृजनात्मकता मुख्य रूप से किस से सम्बन्धित है। 
उत्‍तर - अपसारी चिन्त‍न से । 


प्रश्‍न 33- चिन्तन अनिवार्य रूप से क्या है। 
उत्‍तर - संज्ञानात्मक गतिविधि । 


प्रश्‍न 34- किसी बालक में चिन्तन की योग्यता उसके सफल जीवन का मूल आधार है। यह कथन किसका है। 
उत्‍तर - क्रो और क्रो का । 


प्रश्‍न 35- चिन्तन की दृष्टि से किसी बच्चे में सर्वश्रेष्ठ चिन्तन है। तो उसे क्या कहेगे । 
उत्‍तर - तार्किक चिन्तन । 


प्रश्‍न 36- पियाजे के अनुसार किसी बालक में तार्किकता का अभाव किस आयु तक होता है। 
उत्‍तर - सात वर्ष तक । 


प्रश्‍न 37- किसी बच्चे के चिन्तन में आयु के बढने के साथ – साथ किसकी प्रधानता बढती है। 
उत्‍तर - तर्क की । 


प्रश्‍न 38- जन्म के बाद किसी बालक में चिन्तन का विकास कब प्रारम्भ होता है। 
उत्‍तर - दो वर्ष की आयु के बाद । 


प्रश्‍न 39- किसी छात्र का बौद्धिक विकास शारीरिक विकास तथा संवेगात्मक विकास उसकी विकास की प्रक्रिया का कौन सा कारक है। 
उत्‍तर - आन्‍तरिक कारक । 


प्रश्‍न 40- माता – पिता से सन्तनों को प्राप्त होने वाले गुणों को कहते है। 
उत्‍तर - वंशानुक्रम । 


प्रश्‍न 41- अधिगम की प्रक्रिया पूर्ण कब होती है। 
उत्‍तर - जब व्‍यवहार में स्‍थायी परिवर्तन हो जाए। 


प्रश्‍न 42- मनोविज्ञान का जनक किसे कहा जाता है। 
उत्‍तर - सिंग्‍मण्‍ड फ्रायड को 


प्रश्‍न 43- अंधों की लिपि के जनक किसे कहा जाता है। 
उत्‍तर - लुई ब्रेल 


प्रश्‍न 44- अंधों के लिए लुई ब्रेल ने कौनसी लिपि का प्रतिपादन किया। 
उत्‍तर - ब्रेल लिपि 


प्रश्‍न 45- नर्सरी पद्धति के जनक किसे कहा जात है। 
उत्‍तर - मारिया मांन्‍टेसरी 


प्रश्‍न 46- L.K.G.व U.K.G. पद्धति के जनक है। 
उत्‍तर - फ्रोबेल 


प्रश्‍न 47- जीनपियाजे कहा के मनोवैज्ञानिक थे। 
उत्‍तर - स्विटजरलैण्‍ड के 


प्रश्‍न 48- जीन पियाजे किस विचारधारा के समर्थक थे। 
उत्‍तर - संज्ञानात्‍मक 


प्रश्‍न 49- स्‍कीमा सिद्धांत का जनक किसे माना गया है। 
उत्‍तर - जीन पियाजे 


प्रश्‍न 50- जीनपियाजे ने अपना प्रयोग किस पर किया था। 
उत्‍तर - दो पुत्रियों एवं पुत्र पर 

Sunday, September 15, 2019

प्याज़े का संज्ञानात्मक विकास सिद्धान्त

पियाजे द्वारा प्रतिपादित संज्ञानात्मक विकास सिद्धान्त(theory of cognitive development) मानव बुद्धि की प्रकृति एवं उसके विकास से सम्बन्धित एक विशद सिद्धान्त है। प्याज़े का मानना था कि व्यक्ति के विकास में उसका बचपन एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। पियाजे का सिद्धान्त, विकासी अवस्था सिद्धान्त (developmental stage theory) कहलाता है। यह सिद्धान्त ज्ञान की प्रकृति के बारे में है और बतलाता है कि मानव कैसे ज्ञान क्रमशः इसका अर्जन करता है, कैसे इसे एक-एक कर जोड़ता है और कैसे इसका उपयोग करता है।
व्यक्ति वातावरण के तत्वों का प्रत्यक्षीकरण करता है; अर्थात् पहचानता है, प्रतीकों की सहायता से उन्हें समझने की कोशिश करता है तथा संबंधित वस्तु/व्यक्ति के संदर्भ में अमूर्त चिन्तन करता है। उक्त सभी प्रक्रियाओं से मिलकर उसके भीतर एक ज्ञान भण्डार या संज्ञानात्मक संरचना उसके व्यवहार को निर्देशित करती हैं। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि कोई भी व्यक्ति वातावरण में उपस्थित किसी भी प्रकार के उद्दीपकों (स्टिमुलैंट्स) से प्रभावित होकर सीधे प्रतिक्रिया नहीं करता है, पहले वह उन उद्दीपकों को पहचानता है, ग्रहण करता है, उसकी व्याख्या करता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि संज्ञात्माक संरचना वातावरण में उपस्थित उद्दीपकों और व्यवहार के बीच मध्यस्थता का कार्य करता हैं।
ज्याँ प्याजे ने व्यापक स्तर पर संज्ञानात्मक विकास का अध्ययन किया। पियाजे के अनुसार, बालक द्वारा अर्जित ज्ञान के भण्डार का स्वरूप विकास की प्रत्येक अवस्था में बदलता हैं और परिमार्जित होता रहता है। पियाजे के संज्ञानात्मक सिद्धान्त को विकासात्मक सिद्धान्त भी कहा जाता है। चूंकि उसके अनुसार, बालक के भीतर संज्ञान का विकास अनेक अवस्थाओ से होकर गुजरता है, इसलिये इसे अवस्था सिद्धान्त (STAGE THEORY ) भी कहा जाता है।
पियाजे ने संज्ञानात्मक विकास को चार अवस्थाओं में विभाजित किया है-
  • (१) संवेदिक पेशीय अवस्था (Sensory Motor) : जन्म के 2 वर्ष
  • (२) पूर्व-संक्रियात्मक अवस्था (Pre-operational) : 2-7 वर्ष
  • (३) मूर्त संक्रियात्मक अवस्था (Concrete Operational) : 7 से12 वर्ष
  • (४) अमूर्त संक्रियात्मक अवस्था (Formal Operational) : 12से 18वर्ष

संवेदी पेशीय अवस्थासंपादित करें

इस अवस्था में बालक केवल अपनी संवेदनाओं और शारीरिक क्रियाओं की सहायता से ज्ञान अर्जित करता है। बच्चा जब जन्म लेता है तो उसके भीतर सहज क्रियाएँ (Reflexes) होती हैं। इन सहज क्रियाओं और ज्ञानन्द्रियों की सहायता से बच्चा वस्तुओं ध्वनिओं, स्पर्श, रसो एवं गंधों का अनुभव प्राप्त करता है और इन अनुभवों की पुनरावृत्ति के कारण वातावरण में उपस्थित उद्दीपकों की कुछ विशेषताओं से परिचित होता है।
¤ उन्होने इस अवस्था को छः उपवस्था मे बाटा है ~
1- सहज क्रियाओ की अवस्था (जन्म से 30 दिन तक)
2- प्रमुख वृत्तीय अनुक्रियाओ की अवस्था ( 1 माह से 4 माह)
3- गौण वृत्तीय अनुक्रियाओ की अवस्था ( 4 माह से 8 माह)
4- गौण स्किमेटा की समन्वय की अवस्था ( 8 माह से 12 माह )
5- तृतीय वृत्तीय अनुक्रियाओ की अवस्था ( 12 माह से 18 माह )
6- मानसिक सहयोग द्वारा नये साधनों की खोज की अवस्था ( 18 माह से 24 माह )

पूर्व-संक्रियात्मक अवस्थासंपादित करें

इस अवस्था में बालक स्वकेन्द्रित व स्वार्थी न होकर दूसरों के सम्पर्क से ज्ञान अर्जित करता है। अब वह खेल, अनुकरण, चित्र निर्माण तथा भाषा के माध्यम से वस्तुओं के संबंध में अपनी जानकारी अधिकाधिक बढ़ाता है। धीरे-धीरे वह प्रतीकों को ग्रहण करता है किन्तु किसी भी कार्य का क्या संबंध होता है तथा तार्किक चिन्तन के प्रति अनभिज्ञ रहते हैं। इस अवस्था में अनुक्रमणशीलता पायी जाती है। इस अवस्था मे बालक के अनुकरणो मे परिपक्वता आ जाती है इस अवस्था मे प्रकट होने वाले लक्षण दो प्रकार के होने से इसे दो भागों में बांटा गया है। 1. पूर्व प्रत्यात्मक काल: (2-4 वर्ष) 2. अंतः प्रज्ञककाल: / अन्तर्दर्शि अवधि (4-7 वर्ष)

मूर्त संक्रियात्मक अवस्थासंपादित करें

इस अवस्था में बालक विद्यालय जाना प्रांरभ कर लेता है एवं वस्तुओं एव घटनाओं के बीच समानता, भिन्नता समझने की क्षमता उत्पन हो जाती है इस अवस्था में बालकों में संख्या बोध, वर्गीकरण, क्रमानुसार व्यवस्था किसी भी वस्तु ,व्यक्ति के मध्य पारस्परिक संबंध का ज्ञान हो जाता है। वह तर्क कर सकता है। संक्षेप में वह अपने चारों ओर के पर्यावरण के साथ अनुकूल करने के लिये अनेक नियम को सीख लेता है।

औपचारिक या अमूर्त संक्रियात्मक अवस्थासंपादित करें

यह अवस्था 12 वर्ष के बाद की है इस अवस्था की विशेषता निम्न है :-
  • तार्किक चिंतन की क्षमता का विकास
  • समस्या समाधान की क्षमता का विकास
  • वास्तविक-आवास्तविक में अन्तर समझने की क्षमता का विकास
  • वास्तविक अनुभवों को काल्पनिक परिस्थितियों में ढालने की क्षमता का विकास
  • परिकल्पना विकसित करने की क्षमता का विकास
  • विसंगंतियाँ के संबंध में विचार करने की क्षमता का विकास

जीन पियाजे ने संज्ञानात्मक विकास की प्रकिया में मुख्यतः दो बातों को महत्वपूर्ण माना है। पहला संगठन दूसरा अनुकूलन। संगठन से तात्पर्य बुद्धि में विभिन्न क्रियाएँ जैसे प्रत्यक्षीकरण, स्मृति , चिंतन एवं तर्क सभी संगठित होकर करती है। उदा. एक बालक वातावरण में उपस्थित उद्दीपकों के संबंध में उसकी विभिन्न मानसिक क्रियाएँ पृथक पृथक कार्य नहीं करती है बल्कि एक साथ संगठित होकर कार्य करती है। वातावरण के साथ समायोजन करना संगठन का ही परिणाम है। संगठन व्यक्ति एवं वातावरण के संबंध को आंतरिक रूप से प्रभावित करता है। अनुकूलन बाह्य रूप से प्रभावित करता है।

Saturday, September 14, 2019

अभिप्रेरणा


अभिप्रेरणा (Motivation)

प्रेरणा शब्द लैटिन भाषा के “मौटम” शब्द से बना है, जिसका अर्थ है- motor तथा motion इसके अनुसार प्रेरणा में गति होना अनिवार्य है|
मनोवैज्ञानिक क्रेच तथा क्रेचफील्ड के अनुसार प्रेरणा हमारे ‘क्यों’ का उत्तर देती हैं|
हम किसी से क्यों प्यार करते हैं?
हम किसी से क्यों घृणा करते हैं?
तारे दिन में क्यों दिखाई नहीं देते हैं?

शिक्षा एक जीवनपर्यंत चलने वाली प्रक्रिया है अर्थात क्रिया है|
किसी भी क्रिया के पीछे एक बल कार्य करता है जिसे हम प्रेरक बल कहते हैं| उसी प्रकार शिक्षा प्राप्त करने की प्रक्रिया में कार्य करने वाला बल अभिप्रेरणा है|

प्रेरकों का वर्गीकरण(Classification of motives)

आंतरिक अभिप्रेरक

जिन्हें हम व्यक्तिगत, जैविक, प्राथमिक, जन्मजात अभिप्रेरक आदि भी कहते हैं
| भूख,प्यास,आराम,नींद,प्यार,क्रोध,सेक्स,मल-मूत्र त्याग आदि|

बाह्य अभिप्रेरक

जिन्हें हम सामाजिक,मनोवैज्ञानिक,द्वितीयक,अर्जित अभिप्रेरक कहते हैं|
सुरक्षा,प्रदर्शन,जिज्ञासा,सामाजिकता,ज्ञान
प्रेरक= आवश्यकता+ चालक+ प्रोत्साहन

आवश्यकता ( need)

यह हमारे शरीर की कोई जरूरत या अभाव है जिसके उत्पन्न होने पर हम शारीरिक असंतुलन या तनाव महसूस करते हैं|
जैसे-भूख लगने पर खाने की आवश्यकता|
बीमार पड़ने पर दवा की आवश्यकता|
अकेले रहने पर साथी की आवश्यकता|
थक जाने पर आराम की आवश्यकता|
“आवश्यकता प्राणी की वहां आंतरिक अवस्था है जो किसी उद्दीपन हो अथवा लक्ष्यों के संबंध में जीवो का क्षेत्र संगठित करती हैं और उन की प्राप्ति हेतु क्रिया उत्पन्न करती हैं |”

चालक/अंतर्नोद/प्रणोदन ( drive)

प्रत्येक आवश्यकता से जुड़ा हुआ एक चालाक होता है|
जैसे- खाने की आवश्यकता से भूख,
पानी की आवश्यकता से प्यास|
जब तक चालक शांत नहीं हो जाता तब तक हम तनाव में रहते हैं|

उद्दीपन/प्रोत्साहन(Incentive)

प्रोत्साहन वातावरण में उपस्थित तत्व है जो हमारे चालक को शांत कर देते हैं|
जैसे- प्यास लगने पर जीव तालाब,झरना,नदी-नाले का पानी पीकर अपनी प्यास बुझाता है|
“उद्दीपन वह वस्तु परिस्थितियां अथवा प्रक्रिया है जो व्यवहार को उत्तेजना प्रदान करती हैं उसे जारी रखती हैं तथा उसे दिशा देती हैं|”
वास्तव में आवश्यकता चालक एवं उद्दीपन में घनिष्ठ संबंध है|
आवश्यकता चालको को जन्म देती हैं| चालक एक तनावपूर्ण स्थिति हैं तथा व्यवहार को एक निश्चित दिशा और रूप प्रदान करती हैं|
उद्दीपन द्वारा आवश्यकता की पूर्ति होती हैं| आवश्यकता की पूर्ति होने के पश्चात चालक समाप्त हो जाते हैं|
थॉमसन के अनुसार अभिप्रेरिक दो प्रकार के होते हैं- 1 स्वाभाविक 2 कृत्रिम
मैस्लो के अनुसार अभिप्रेरक दो प्रकार के होते हैं- 1 जन्मजात 2 अर्जित
गैरेट के अनुसार अभिप्रेरक तीन प्रकार के होते हैं- 1 जैविक 2 मनोवैज्ञानिक 3 सामाजिक

अभिप्रेरणा के प्रकार(Type of motivation)

1 आंतरिक अभिप्रेरणा

जब व्यक्ति स्वयं से प्रेरित होकर कार्य करता है तो इसे यांत्रिक या सकारात्मक अभिप्रेरणा कहते हैं|

2 बाह्य अभिप्रेरणा

जब व्यक्ति स्वयं से प्रेरित ना होकर किसी बाहर के व्यक्ति के द्वारा प्रेरित करने पर कार्य करता है तो इसे बाह्य या नकारात्मक अभिप्रेरणा कहते हैं|

मनोविज्ञान का अर्थ

मनोविज्ञान व्यवहार तथा सामाजिक प्रक्रियाओं का वैज्ञानिक अध्ययन है|” - एटकिंसन, स्मिथ व हिलगार्ड मनोविज्ञान को अंग्रेजी में” साइकोलोजी” कहते हैं| साइकोलोजी शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के दो शब्दों साइकी तथा लोगों से मिलकर हुई है|
साइकि का अर्थ है- आत्मा, लोगस का अर्थ हैं- अध्ययन| अर्थात साइकोलॉजी शब्द का शाब्दिक अर्थ है- आत्मा का अध्ययन
| मनोविज्ञान का प्रारंभ अरस्तु के समय में दर्शनशास्त्र की एक शाखा के रूप में हुआ था धीरे धीरे यह दर्शनशास्त्र से अलग होकर एक स्वतंत्र विषय के रूप में उभरकर सामने आया| दर्शनशास्त्र से एक अलग विषय के रूप में अपने इस यात्रा में मनोविज्ञान को अनेक अर्थ में परिभाषित किया गया |

१ आत्मा का विज्ञान- प्लेटो, अरस्तु

नए मनोविज्ञान को आत्मा का विज्ञान के रूप में स्वीकार किया था| मनोविज्ञान को आत्मा का विज्ञान 16 शताब्दी मैं स्वीकार किया गया|

2 मन या मस्तिष्क का विज्ञान-

17 शताब्दी में दार्शनिकों ने मनोविज्ञान को मन या मस्तिष्क का विज्ञान कहा|
मनिया मस्तिष्क का विज्ञान के आने वाले मुख्य दार्शनिक पान्पोनाजी थे|

३ चेतना का विज्ञान-

मनोविज्ञान को चेतना का विज्ञान 19वी शताब्दी में माना गया| चेतना का विज्ञान मानने वाले मुख्य मनोवैज्ञानिक विलियम जेम्स, विलियम वुंट, जेम्स सली थे|
मैक्डूगल ने अपनी पुस्तक आउटलाइन साइकोलोजी के पृष्ठ संख्या 16 पर चेतना को एक बुरा शब्द बताकर उसकी आलोचना करते हुए लिखा है- “ चेतना एक बहुत बुरा शब्द है और यह मनोविज्ञान के लिए बहुत ही दुर्भाग्य की बात है कि यह शब्द साधारण प्रयोग में आ गया है|”

4 व्यवहार एवं अनुभूति का विज्ञान-

आत्मा, मन और चेतना के विज्ञान के रुप में मान्यता न मिलने पर बीसवीं शताब्दी में मनोविज्ञान को व्यवहार के विज्ञान के रुप में परिभाषित किया गया जिसे सब ने स्वीकार किया| व्यवहार का विज्ञान मानने वाले मुख्य मनोवैज्ञानिक वाटसन, स्किनर व वुदवर्थ थे|

मनोविज्ञान की परिभाषाएं

“ मनोविज्ञान जीवधारी तथा वातावरण की पारस्परिक अंत: क्रिया से संबंधित विज्ञान है”- वारेन
“मनोविज्ञान, मानव व्यवहार एवं मानव संबंधों का अध्ययन है”- क्रो एवं क्रो
“ मनोविज्ञान आचरण एवं व्यवहार का यथार्थ विज्ञान है|” -मैक्दुगल

Sunday, September 8, 2019

बाल विकास का सिद्धांत

पैटर्नों और प्रक्रियाओं से वृद्धि और विकास की पहचान करना और उनका चित्रण करना जरूरी होता है क्योंकि यह बताता है कि बच्चों के भीतर वृद्धि और विकास किस प्रकार से चल रहा है।दिए गए बाल विकास सिद्धांतों की सहायता से, हम आसानी से यह पहचान सकते हैं कि बच्चे कैसे विकास कर रहे हैं और वे किस स्तर पर हैं? ये सिद्धांत हमें बच्चों की विकास दर का अनुमान लगाने में और वे किस विकास क्रम का अनुसरण करेंगे यह जानने में मदद करते हैं| इसके अलावा यह अध्ययन व्यक्ति की विशेषताएं और साथ ही व्यक्तिगत भिन्त्ताओं के बारे में ध्यान में रखते हुए किया जा सकता है।

1. केफालो-कंडल का सिद्धांत:
  • विकास की प्रक्रिया सिर से पैर की अंगुली तकजाती है
  • 6 से 12 महीने के शिशु
  • पैर से पहले हाथों का समन्वय
2. समीपस्थ-बाह्य के सिद्धांत: (proximal-distal)
  • केंद्र से बाह्य
  • रीढ़ की हड्डी शरीर के बाहरी भागों से पहले विकसित होती है।
नोट:  दोनों उपरोक्त सिद्धांत विकास की दिशा को दर्शाते हैं।
3. सरल से जटिल का सिद्धांत:
  • बच्चे द्वारा मानसिक या बौद्धिक क्षमताओं और मौखिक समझ से संबंधित कौशल से संबंधित समस्याओं को हल करने के लिए उपयोग किया जाता है।
  • उदाहरण के लिए, यदि बच्चे को ऑब्जेक्ट को वर्गीकृत करना सीखना होगा तो पतंग और हवाई जहाज उसके लिए समान हो सकते हैं क्योंकि वे दोनों आकाश में उड़ते हैं
  • इस प्रकार की प्रतिक्रिया सोच के पहले स्तर से जुड़ी है और दोनों के बीच विद्यमान विचार पर आधारित है।
  • लेकिन सीखने के बाद के चरण में, वे इन वस्तुओं के बीच अधिक जटिल समानताएं और अंतर को समझ सकेंगे।
  • उदाहरण के लिए, वे यह समझने की कोशिश करेंगे कि पतंग और हवाई जहाज अलग-अलग श्रेणियों से संबंधित हैं।
4. निरंतर प्रक्रिया का सिद्धांत:
  • कौशल में वृद्धि या संचय या निक्षेप कौशल निरंतर आधार पर होता है।
  • कौशल में नियमित-निरंतर जमा होने से अधिक मुश्किल काम की पूर्ति होती है।
  • एक चरण का विकास दूसरे चरण के विकास में मदद करता है।
  • उदाहरण के लिए, भाषा विकास बच्चे में बड़बड़ाने से शुरू होता है फिर भाषा की जटिल समझ में आगे बढ़ता है।
5. सामान्य से विशिष्ट का सिद्धांत: 
  • शिशुओं का मोटर चालन बहुत सामान्यीकृत और अनभिज्ञ है।
  • सबसे पहले सकल / बड़ी मांसपेशियों में मोटर गति कका विकास होता है और फिर अधिक परिष्कृत छोटे / ठीक मोटर की मांसपेशियों की गति को आगे बढ़ती है।
6. व्यक्तिगत वृद्धि और विकास की दर का सिद्धांत:
  • प्रत्येक शिशु अलग है, यही कारण है कि उनकी विकास दर भी भिन्न होती है।
  • विकास का पैटर्न और अनुक्रम आम तौर पर समान होता हैं लेकिन दरों में अंतर होता है
  • यही कारण है कि ‘औसत बच्चे’ जैसा कोई विचार नहीं होना चाहिए क्योंकि हर कोई अपनी दर के अनुसार आगे बढ़ते हैं
  • इसलिए, हम दो बच्चों को उनके बौद्धिक विकास या एक बच्चे की प्रगति के आधार पर दूसरे के साथ तुलना नहीं कर सकते।
  • इसके साथ-साथ विकास की दर भी सभी बच्चों के लिए समान नहीं है।
दिए सिद्धांतों के ज्ञान और समझ से आपको एक शिक्षक के रूप में क्या मदद मिलेगी ?
  • कक्षा में और बाहर की जाने वाली गतिविधियों की योजना।
  • शिक्षार्थियों के अनुभवों के संज्ञानात्मक प्रभावों को बनाने में मदद मिलेगी।

बाल विकाश पर आनुवंशिकता और पर्यावरण का प्रभाव

  • प्रकृति बनाम अभिभावक।
  • आनुवंशिकता बनाम पर्यावरण
  • आनुवांशिक प्रभाव बनाम पर्यावरण प्रभाव
  • इंटर्न / जन्मजात गुण बनाम व्यक्तिगत / अन्वेषित अनुभव
1. प्लेटो और सुकरात: गुण और लक्षण जन्मजात होते हैं और वे पर्यावरण प्रभावों से वंचित स्वाभाविक रूप से होते हैं।
2. जे. लोके और तबुला रास: उन्होंने सुझाव दिया कि मस्तिष्क बिलकुल सपाट होता है अर्थात हम अपने जीवन के विभिन्न वर्षों में जो भी बनते हैं वो अनुवांशिकी के प्रभाव से रहित अपने अनुभव के कारण बनते हैं।
लेकिन वास्तव में, अनुवांशिकी और पर्यावरण  परस्पर क्रिया करते हैं, प्रकृति और पोषण दोनों एक व्यक्ति के विकास को प्रभावित करते हैं। मुख्य बात यह है कि यदि हम जीवित जीव की जटिलता समझना चाहते हैं (अर्थात मनुष्य) तो अनुवांशिकी, पर्यावरण और अनुवांशिकी और पर्यावरण की परस्पर क्रिया का अध्ययन करना होगा ।

Tuesday, September 3, 2019

शिक्षा मनोविज्ञान

  • शिक्षा मनोविज्ञान आवश्यक है – शिक्षाएवं अभिभावकों के लिए
  • शिक्षा मनोविज्ञान का मुख्य सम्बन्ध सिखने से है l यह कथन है – सॉरे एवंटेलफ़ोर्ड का
  • मनोविज्ञान की आधारशिला किस पुस्तक में राखी गई- मनोविज्ञान के सिद्धान्त
  • अमेरिका में प्रकाशित ‘Principal of Psychology’ के लेखक हैं – विलियमजेम्स
  • शिक्षा मनोविज्ञान का वर्तमान स्वरुप है –व्यापक
  • गौरिसन के अनुसार शिक्षा मनोविज्ञान का उदेश्य है – व्यवहार का ज्ञान
  • कुप्पूस्वामी के अनुसार शिक्षा मनोविज्ञान के सिद्धांन्तों का सर्वोत्तम प्रयोग होता है –उत्तम शिक्षा एवं उत्तम अधिगम में
  • शिक्षा मनोविज्ञान का प्रमुख उदेश्य कोलेसनिक के अनुसार है – शिक्षा कीसमस्याओं का समाधान करना
  • कैली के अनुसार शिक्षा मनोविज्ञान के उदेश्य हैं – नौ
  • स्किनर के अनुसार शिक्षा मनोविज्ञान के सामान्य उदेश्य हैं – बाल विकास
  • स्किनर के अनुसार शिक्षा मनोविज्ञान के विशिष्ट उदेश्य हैं – बालकों के वांछनीयव्यवहार के अनुरूप शिक्षा के स्तर एवंउदेश्यों को निचित करने में सहायता करना
  • शिक्षा मनोविज्ञान के क्षेत्र में वह सभी ज्ञान और विधियां सम्मिलित हैं जो सिखने की प्रक्रिया से अधिक अच्छी प्रकार समझने में सहायक हैं l यह कथन है – ली का
  • गेट्स के अनुसार शिक्षा मनोविज्ञान की सिमा है – अस्थिर एवं परिवर्तनशील
  • “अवस्था विशेष के आधार पर ही हमें किसी को बालक युवा या वृद्ध कहना चाहिए l ” यह कथन है – फ़्रॉबेल का
  • हरबर्ट के अनुसार शिक्षा सिद्धान्तों का आधार होना चाहिए – मनोविज्ञानिक
  • माण्टेसरी के अनुसार एक अध्यापक द्वारा उस स्थिति में ही शिक्षण कार्य प्रभावी ढंग से किया जा सकता है, जब उसे ज्ञान होगा– मनोविज्ञान के प्रयोगात्मक स्वरुप का
  • वर्तमान समय में शिक्षा मनोविज्ञान की आवश्यकता है – बाल केन्द्रित शिक्षा
  • वर्तमान समय में शिक्षा मनोविज्ञान की आवश्यकता समझी जाती है – सर्वांगीणविकास में
  • शिक्षा मनोविज्ञान का प्रमुख लाभ है शिक्षक शिक्षार्थी मधुर संम्बन्ध
  • कक्षा में छात्रों को उनकी विभिन्नताओं के आधार पर पहचानने के लिए शिक्षक को ज्ञान होना चाहिए – शिक्षा मनोविज्ञान का
  • समय सरणी में गणित, विज्ञान या कठिन विषय के कालांश पहले क्यों रखे जाते हैं मनोविज्ञान के आधार पर
  • सफल एवं प्रभावशाली शिक्षा अधिगम प्रक्रिया के लिए आवश्यक है– शिक्षणअधिगम सामग्री का प्रयोग एवं शिक्षामनोविज्ञान के सिद्धान्तों का प्रयोग
  • निर्देशन एवं परामर्श में किस विषय का अधिक उपयोग किया जाता है – शिक्षामनोविज्ञान का
  • छात्रों की योग्यता एवं रूचि के आधार पर पठ्यक्रम निर्माण में योगदान होता है शिक्षा मनोविज्ञान का
  • बुद्धि परीक्षण विषय है – शिक्षा मनोविज्ञानका
  • शिक्षक मनोविज्ञान के ज्ञान द्वारा बालकों की – बुद्धि तथा रुचियों की जानकारीकरके शिक्षा देता है , प्रकृति को जान करशिक्षा देता है और आर्थिक स्तिथि तथापारिवारिक स्थिति की जानकारी लेकरशिक्षा देता है
  • मनोविज्ञान का शिक्षा के क्षेत्र में योगदान है – अब शिक्षा बाल केन्द्रित हो गई है ,शिक्षक बालकों से निकट का संम्पर्कस्थापित करने का प्रयास करता है औरशिक्षक को छात्रों की आवश्यकता का ज्ञानहो सकता है l
  • शिक्षा मनोविज्ञान एक विज्ञान है – शैक्षिकसिद्धान्तों का
  • शिक्षा मनोविज्ञान की उत्पति मानी जाती है– वर्ष 1900
  • ‘मनोविज्ञान’ शब्द के समांनान्तर अंग्रेजी भाषा के शब्द ‘साइकोलॉजी’ की व्युत्पत्ति किस भाषा से हुई है – ग्रीक भाषा से
  • शिक्षा मनोविज्ञान का सम्बन्ध है – शिक्षासे , दर्शन से और मनोविज्ञान से
  • शिक्षा का शाब्दिक अर्थ है – पालनपोषण करना , सामने लाना और नेत्रित्वदेना
  • “मनोविज्ञान वातावरण के सम्पर्क में आने वाले व्यक्तियों के क्रियाकलापों का विज्ञान है l ” यह कथन है – वुडवर्थ का

डॉ. जीन पियाजे के सम्पूर्ण अधिगम से संबंधित सिद्धांत

डॉ. जीन पियाजे ( 1896-1980 ) स्विस मनोवैज्ञानिक थे। वे मूल रूप से प्राणी शास्त्री थे, लेकिन उन्होंने मनोविज्ञान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण क...